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कोई पूछे इन मौत के

हस्ताक्षरों से

कि क्या मिल गया

इन मासूम

हँसती मुस्कराती

जिंदगियों को

मौत के गले लगाकर ….

अरे अगर ये धर्म है

तो तौबा करो ऐसे धर्म से

अौर अगर ये

मजहब की लड़ाई है

तो नहीं चाहिये

ऐसा धर्म ऐसा मजहब

बस इन्सानियत का

एक धर्म ही काफी है

जिसके साथ

इन्सान को

पैदा किया गया था

स्मृतियाँ


स्मृतियाँ  ढीठ सी … 

.

स्मृतियों के 

पाँव नहीं थकते  

जीवन भर चलती हैं

सफर में रहती हैं 

जब देखो जहाँ तहाँ

बुलाये – बिनबुलाये 

मेहमान सी, 

शिरकत करती हैं 

बस जरा सी झिरी 

कहीं खुली पा जाएँ 

तो सर पर सवार हो लेती हैं 

फिर लाख चाहो, 

आँखें मूँदो, अबोला करो 

मगर ये हैं कि ढीठ सी 

बस जमी ही रहती हैं  …..

**

अतीत के जंगल


यादों के संदेशे

जब तब

सांकल

खटका जाते हैं…

..

भूले  बिसरे

ना जाने

कितने पल

चौखट पर

अटका जाते हैं …

..

और

मन बेचारे को…

जब तब

अतीत के जंगल में

भटका जाते हैं  …

..


-:-

व्यापार नहीं होते रिश्ते, इनमे तो जीवन होता है

कुछ ऊँचा-नीचा हो जाये तो सांसें घुटने लगती हैं

-:-

संबंधों में जब अनुबंधों की कीमत लगने लगती है

रिश्तों की मर्यादा तब घुट घुट कर मरने लगती है

-:-

धन दौलत पर जो टिकते हैं वो जीवन भर कब चलते

ये बिना मौत मर  जाते हैं जब इनकी कीमत लगती है

-:-

बोन्साई …..


 

बोन्साई 
यानि कि 
प्राकृतिक को 
अप्राकृतिक ढंग से 
काटना, छांटना, तराशना 
और अपनी मर्जी से 
अपनी सुविधा 
अपने शौक के हिसाब से 
जिन्दा रखना !!

   -:-

लेकिन रिश्ते 
जंगली फूल की तरह होते हैं 
अपनी मर्जी से 
अपनी जरुरत के हिसाब से 
जिंदगी की 
हवा पानी रौशनी लेते हैं 
फलते हैं फूलते हैं 
और अगर कभी 
इनको बोन्साई बनाने की 
कोशिश की तो 
ये जीते नहीं मर जाते हैं !!!

****

Juniper Bonsai by Jose Luis Blasco Paz

( चित्र गूगल से साभार )

 

तुम और हम ….


मुझमे और तुममे
फर्क
बस इतना सा है कि
मैं
छोटी छोटी बातों में
बड़ी बड़ी खुशियां ढूंढ लेती हूँ
और तुम
बड़े बड़े सपनों के लिए
छोटी छोटी खुशियां
नज़र अंदाज कर देते हो
जाने कौन सी
मंजिलों की तलाश में
भटका करते हो
दो पल को चैन नहीं
जैसे पैरों में पहिये लगे हों
बस भागते ही रहते हो
बातें बड़ी बड़ी करते हो
लेकिन खुशियों के नाम पर
कंजूसी कर जाते हो !!!
-:-

क्या करें …
हम
हमेशा यूँ ही हार जाते हैं
तुम से,
अपने आप से
और शायद
तुम्हारे इस संसार से भी
हमें चाहिए
खुली हवा, महकते फूल
कुछ खिलखिलाहटें
नदी किनारे का टहलना
बर्फ के गोले को खाते हुए
दुनिया भर की बातें बांटना
पर, तुम्हारे पास वक्त ही कहाँ
मेरी इन बचकानी बातों के लिए ….
-:-

यादें ….


1. 

यादों के परिंदे

जब तब आ बैठते हैं 

जिंदगी की मुंडेर पर 

कभी धूप  कभी छाँव 

तो कभी बारिश 

में भीगते 

याद आते हैं 

भूले बिसरे पल 

और फिर 

अगले ही पल 

फुर्र से ये जा वो जा 

और पाँव हकीकत की 

जमीन पर !!!

-:-

 

2.

 

ये यादें 

कभी फूल 

तो कभी काँटे 

सुख दुख सब कुछ बाँटें 

चाहो न चाहो  

आती हैं जाती हैं 

अपनी मर्जी की मालिक हैं 

लेकिन इनका होना ही 

जिंदगी की निशानी हैं 

जिस दिन ये साथ छोड़ देती हैं 

अल्ज़ाइमर  हो जाता है 

और हम 

बस मिट्टी  का ढेर 

बन कर  रह जाते हैं 

-:-

 

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