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जन्माष्टमी


कहाँ हो कान्हा 

अब आ भी जाओ ना

काटे नहीं कटते 

तुम्हारे बिना

दुःख इस धरा के 

ले ही लो अवतार 

फ़िर छिड़ा है 

महाभारत 

दांव पर लगी  है 

नारी की अस्मिता 

बचा सको तो  बचा लो

या तुमने भी 

मूँद ली हैं अाँखें 

कर लिया है किनारा

कलयुग के राज मे 

हम धरणी वासियों से 

 

या डर गये हो

अाज के 

अाधुनिक दुर्योधनों से 

अगर तुम हो कहीं

तो शपथ है तुम्हे 

इस जन्माष्टमी से 

इनकी 

उल्टी गिनती 

शुरू कर ही देना 

अौर नष्ट कर देना

इस पाप की बेल को !

जन गण मन ….


एक प्रजाति
जो जन गण मन
सुनकर
कभी भी कहीं भी
सावधान की मुद्रा में
खड़ी हो जाती थी
आज
विलुप्त होने की
कगार पर है

हाँ
यूँ झंडा फहराने की रस्म
अदा करने वाली प्रजाति
पूरे उफान पर है
कपडे-लत्ते
यहाँ तक कि श्रृंगार भी
सब का सब
पूरा तिरंगा
झंडे के रंगों का ही
अनुकरण करता दीखता है
==========

दंग रह गयी मैं
कल
एक सुन्दर नारी की
देशभक्ति देख कर
बीच में सफ़ेद दांतों की
चमकती हुयी पंक्ति
एक होठ पर हरी तो
एक होठ पर नारंगी लिपस्टिक
बिलकुल साक्षात
तिरंगा लहराता हुआ   
सभी को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनायें !   :-) :-)


चाहती तो हूँ

तुम्हे

शब्दों में समेट लूँ 

बाँध दूँ ग़ज़ल में

या ढाल दूँ

गीत के स्वरों में

मगर

आसान नहीं है 

तुम तो

समय की तरह 

फिसल जाते हो 

मुट्ठी से !!

अक्सर 

आते हो 

ख्वाबों की तरह 

सिमटते हो 

पलकों में 

और फिर 

न जाने कब 

ग़ुम  हो जाते हो 

जैसे 

झर गयी हो रेत 

मुट्ठी से ! 

सांझा


जब तुम्हारे आंगन में
चमकता है भोर का तारा
तब मेरे आंगन में भी तो
रातों की स्याही छँटने लगती है
तुम्हारी बस्ती का शोर हवा में
उड़कर जब जब आता है
मेरी बस्ती की ख़ामोशी भी
घटने लगती है….
सब कुछ
सांझा ही तो है
जिस दिन हम ये समझ लेंगे
सारी समस्या ही हल हो जायेगी
जो तुम्हारा है वो मेरा भी होगा
अौर जो मेरा होगा
वो तुम्हारा भी होगा
दर-असल
सब सबका सांझा होगा ……


कुछ नयी क्षणिकाएँ

 

*

जुगनुओं पर

बहुत भरोसा मत करना

इनका क्या

ये तो मनमौजी ठहरे

अभी यहाँ तो अभी वहां

टिकते कहाँ है कहीं

रौशनी चाहिए तो

दिए ही जलाना

****

 

मुझे

सफर में ही रहने दे

मैं तो जिन्दा ही हूँ

क्यूंकि चल रहा हूँ

जिस दिन रुका

वो मेरी मंज़िल नहीं

मेरा अंत होगा

****

 

मुझसे  मिलते रहना

सवाल बन कर

वर्ना जिस दिन

सारे जवाब मिल गए

मेरे होने का

मकसद ही

न ख़त्म हो जाये …

****

 

यूँ मेरे अकेलेपन में

थामने को

हाथ तो बहुत होंगे

लेकिन क्या

उनमे से कोई

तुम जैसा भी होगा

जो समझ लेगा

मेरी ख़ामोशी

पढ़ लेगा मेरी आँखें

या फिर

बांच लेगा

मुझे किताब सा …

******

 

आंसू की बूँद

माशूक की आँख से गिरे

आशिक की हथेली पर पड़े

तो अनमोल

गरीब के गाल पर रहे

तो बेमोल

जगह जगह की बात है

कैसे सन्दर्भ बदल जाते हैं

*****

 

टूट जाते हैं

अक्सर

भरोसे के तार

धोखा भी तो

वहीँ  होता है न

जहाँ विश्वास गहरा हो

*****

 

 

नदी गहरी है

ये सोच कर बस

किनारे ही बैठ रहना

हौसलों का क़त्ल है

उठो, पानी में

उत्तर कर तो देखो

क्या पता

पार ही हो लो

*****

 

मै

बनना चाहता हूँ

आकाश

उड़ाना चाहता हूँ

अपने सपनों को

पाखी बनाकर

देना चाहता हूँ

ऊंची परवाज

मेरे ख्यालों को

काश कि

तुम साथ होते !

*****

 

जिंदगी के

रास्ते

अक्सर

ठहर से जाते हैं

उम्र भर चलो

पांवों में छाले

जोड़ों में दर्द और

बालों में चांदी

कर लो

पर ख़त्म ही नहीं होते

*****

मैं….कुछ हाइकू


बांधना मत 
हवा का झोंका हूँ मैं 
रुकता नहीं 

*

पानी की धार 
चाहूँ तो काट दूं मैं 
पत्थर को भी

 
*

आग का शोला 
जलता भी, और मैं 
जलाता भी हूँ 

*

गोद में मेरी 
पले हैं ईश्वर भी 
धरती हूँ मैं

 
*

भरें उड़ान 
सपने और पाखी 
आकाश हूँ मैं

 
*

अगले पड़ाव पर ….


 

शर्तों में बंध कर रहना 
न तुमसे होगा 
न मुझसे …..
क्योंकि 
हम दोनों ही कुछ 
अलग ही मिट्टी के बने हैं

फिर आओ 
क्यूँ न हम 
स्वीकार कर लें 
एक दूसरे को 
पूरी उदारता के साथ 
जब जहाँ जैसा की स्थिति में

न कोई 
जो है से ज्यादा की अपेक्षा 
और 
न अपेक्षाएं टूटने का दर्द 
बस 
मित्रता का खुला आसमान
और हम तुम 
पखेरुओं से 
अपनी अपनी 
परवाज नापते हुए 
जब कहीं थक कर 
सुस्ताने बैठे 
तो एक दूसरे को 
स्नेहिल मुस्कान का 
संबल देते हुए

सुस्ता लिए 
तो फिर उड़ चले 
अनंत आकाश में 
उन्मुक्त 
खुली हवा, धूप, बारिश 
सब बटोरते हुए 
अगले पड़ाव पर बांटने के लिए ……

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