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व्यापार नहीं होते रिश्ते, इनमे तो जीवन होता है

कुछ ऊँचा-नीचा हो जाये तो सांसें घुटने लगती हैं

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संबंधों में जब अनुबंधों की कीमत लगने लगती है

रिश्तों की मर्यादा तब घुट घुट कर मरने लगती है

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धन दौलत पर जो टिकते हैं वो जीवन भर कब चलते

ये बिना मौत मर  जाते हैं जब इनकी कीमत लगती है

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बोन्साई …..


 

बोन्साई 
यानि कि 
प्राकृतिक को 
अप्राकृतिक ढंग से 
काटना, छांटना, तराशना 
और अपनी मर्जी से 
अपनी सुविधा 
अपने शौक के हिसाब से 
जिन्दा रखना !!

   -:-

लेकिन रिश्ते 
जंगली फूल की तरह होते हैं 
अपनी मर्जी से 
अपनी जरुरत के हिसाब से 
जिंदगी की 
हवा पानी रौशनी लेते हैं 
फलते हैं फूलते हैं 
और अगर कभी 
इनको बोन्साई बनाने की 
कोशिश की तो 
ये जीते नहीं मर जाते हैं !!!

****

Juniper Bonsai by Jose Luis Blasco Paz

( चित्र गूगल से साभार )

 

तुम और हम ….


मुझमे और तुममे
फर्क
बस इतना सा है कि
मैं
छोटी छोटी बातों में
बड़ी बड़ी खुशियां ढूंढ लेती हूँ
और तुम
बड़े बड़े सपनों के लिए
छोटी छोटी खुशियां
नज़र अंदाज कर देते हो
जाने कौन सी
मंजिलों की तलाश में
भटका करते हो
दो पल को चैन नहीं
जैसे पैरों में पहिये लगे हों
बस भागते ही रहते हो
बातें बड़ी बड़ी करते हो
लेकिन खुशियों के नाम पर
कंजूसी कर जाते हो !!!
-:-

क्या करें …
हम
हमेशा यूँ ही हार जाते हैं
तुम से,
अपने आप से
और शायद
तुम्हारे इस संसार से भी
हमें चाहिए
खुली हवा, महकते फूल
कुछ खिलखिलाहटें
नदी किनारे का टहलना
बर्फ के गोले को खाते हुए
दुनिया भर की बातें बांटना
पर, तुम्हारे पास वक्त ही कहाँ
मेरी इन बचकानी बातों के लिए ….
-:-

यादें ….


1. 

यादों के परिंदे

जब तब आ बैठते हैं 

जिंदगी की मुंडेर पर 

कभी धूप  कभी छाँव 

तो कभी बारिश 

में भीगते 

याद आते हैं 

भूले बिसरे पल 

और फिर 

अगले ही पल 

फुर्र से ये जा वो जा 

और पाँव हकीकत की 

जमीन पर !!!

-:-

 

2.

 

ये यादें 

कभी फूल 

तो कभी काँटे 

सुख दुख सब कुछ बाँटें 

चाहो न चाहो  

आती हैं जाती हैं 

अपनी मर्जी की मालिक हैं 

लेकिन इनका होना ही 

जिंदगी की निशानी हैं 

जिस दिन ये साथ छोड़ देती हैं 

अल्ज़ाइमर  हो जाता है 

और हम 

बस मिट्टी  का ढेर 

बन कर  रह जाते हैं 

-:-

 

इस दिवाली में ….


दीवाली के दिए उनके लिए रोटी का जरिया हैं
वो मिटटी गूंधते हैं, तो रोटी घर में पकती है

**

अंधेरों की घुटन से,  क्या तो छूटेंगे कभी,  ये पर
जले चूल्हे में गर लकड़ी बहुत इनको दिवाली में

**

इन्हे तो चाँद भी सपने में, रोटी सा ही दिखता है
मिले भरपेट खाना, इतनी ही तमन्ना है दिवाली में

**

चलो कुछ हाथ हम इनका बँटाएं इस दिवाली में
दिये मिटटी के कुछ लेकर जलाएं इस दिवाली में

**

मुहैया हमने जो उनको निवाले चार कर पाये
समझेंगे,  उजाला कुछ किया हमने दिवाली में

**

Happy Diwali to all !!

करवाचौथ – दो हाइकू



उगे चाँद सा
बिखरे चांदनी सा
प्यार ही प्यार

लिखवाता है
अनुबंध प्यार के
करवाचौथ !!


भीतर का खौफ

जब आँखों में उतरकर

आंसू बनता है

दर्द बह निकलता है

बेबसी बन कर

 

हमारी चुप्पी पर

वो समझते हैं

हम उनके साथ हैं

लेकिन नहीं

हम साथ नहीं

हम तो लाचार हैं

हम जानते ही नहीं कि

हमें क्या करना चाहिए

कहाँ जाना चाहिए

बस

इसी लिए हम

उनकी हाँ में हाँ मिलाते हैं

और

उनकी हर  सही गलत बात पे

चाभी भरे खिलौने की तरह

लगातार ताली बजाते हैं ….

 

हम शायद

ताली बजाने के लिए ही पैदा हुए हैं  ……

जिसका जी चाहे

या फिर

जिसके हाथ में लाठी हो

कुछ जुमले उछाले

और

हमसे ताली बजवा ले

अपनी पीठ ठोंक ले

अपने समर्थ होने की

सनद लिख ले

और

हमारी छाती पर पाँव रख कर

अपना आसमान छू ले !

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