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कुछ क्षणिकायें ….


 

हमारा दर्द

तुम्हारी बेरुखी से मिलकर

अक्सर बेपर्दा हो जाता है

छुपाने का हुनर

तो हमें यूँ भी नहीं आता !!!

-:-

चलो अच्छा हुआ

आइनों ने ही समझा दिया

वर्ना

तुम हमारी कहाँ सुनते !!!

-:-

आँसू समेटने को

रुमाल तो बहुत मिलेंगे

मगर जिस सीप में पड़कर

मोती बनजाये, ऐसा दिल

जरा मुश्किल से मिलता है

-:-

यादें भी न ….

बस परिंदो सी ही होती हैं

पल भर मे यहाँ

तो पल भर में वहां

मन के अन्दर ही अन्दर

नाप लेती हैं सारा जहाँ ….

जिंदगी की नाप तौल ….


अक्सर

तोलती रहती है जिंदगी 

हमें अपने तराजू पर

कभी कुछ ज्यादा तो 

कभी कुछ कम ….

बहुत कम ही होता है 

जब 

सब नाप तौल में 

एकदम बराबर हो 

वर्ना तो 

बन्दर बाँट ही लगी रहती है 

कभी खुशियों  का पलड़ा भारी 

तो कभी आंसुओं का  !!

खफ़ा खफ़ा सा चाँद …


-:-

खफ़ा खफ़ा सा चाँद आजकल छुपता छुपता फिरता है

ले बादल की ओट मनचला आखँ मिचोली करता है

-:-

जन्माष्टमी


कहाँ हो कान्हा 

अब आ भी जाओ ना

काटे नहीं कटते 

तुम्हारे बिना

दुःख इस धरा के 

ले ही लो अवतार 

फ़िर छिड़ा है 

महाभारत 

दांव पर लगी  है 

नारी की अस्मिता 

बचा सको तो  बचा लो

या तुमने भी 

मूँद ली हैं अाँखें 

कर लिया है किनारा

कलयुग के राज मे 

हम धरणी वासियों से 

 

या डर गये हो

अाज के 

अाधुनिक दुर्योधनों से 

अगर तुम हो कहीं

तो शपथ है तुम्हे 

इस जन्माष्टमी से 

इनकी 

उल्टी गिनती 

शुरू कर ही देना 

अौर नष्ट कर देना

इस पाप की बेल को !

जन गण मन ….


एक प्रजाति
जो जन गण मन
सुनकर
कभी भी कहीं भी
सावधान की मुद्रा में
खड़ी हो जाती थी
आज
विलुप्त होने की
कगार पर है

हाँ
यूँ झंडा फहराने की रस्म
अदा करने वाली प्रजाति
पूरे उफान पर है
कपडे-लत्ते
यहाँ तक कि श्रृंगार भी
सब का सब
पूरा तिरंगा
झंडे के रंगों का ही
अनुकरण करता दीखता है
==========

दंग रह गयी मैं
कल
एक सुन्दर नारी की
देशभक्ति देख कर
बीच में सफ़ेद दांतों की
चमकती हुयी पंक्ति
एक होठ पर हरी तो
एक होठ पर नारंगी लिपस्टिक
बिलकुल साक्षात
तिरंगा लहराता हुआ   
सभी को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनायें !   :-) :-)


चाहती तो हूँ

तुम्हे

शब्दों में समेट लूँ 

बाँध दूँ ग़ज़ल में

या ढाल दूँ

गीत के स्वरों में

मगर

आसान नहीं है 

तुम तो

समय की तरह 

फिसल जाते हो 

मुट्ठी से !!

अक्सर 

आते हो 

ख्वाबों की तरह 

सिमटते हो 

पलकों में 

और फिर 

न जाने कब 

ग़ुम  हो जाते हो 

जैसे 

झर गयी हो रेत 

मुट्ठी से ! 

सांझा


जब तुम्हारे आंगन में
चमकता है भोर का तारा
तब मेरे आंगन में भी तो
रातों की स्याही छँटने लगती है
तुम्हारी बस्ती का शोर हवा में
उड़कर जब जब आता है
मेरी बस्ती की ख़ामोशी भी
घटने लगती है….
सब कुछ
सांझा ही तो है
जिस दिन हम ये समझ लेंगे
सारी समस्या ही हल हो जायेगी
जो तुम्हारा है वो मेरा भी होगा
अौर जो मेरा होगा
वो तुम्हारा भी होगा
दर-असल
सब सबका सांझा होगा ……

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