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ये प्रेम भी 
अजीब चीज है 
पल भर में 
किसी को 
आपके लिए 
पूरा ब्रह्माण्ड सा ही 
बना देता है 
और उसे ही
एक दुर्भाग्यपूर्ण पल में
नजरों से गिरा कर
धूल में भी मिला देता है ।१।

**

प्रेम का होना
और प्रेम का टूटना
दोनों ही स्थितियां
विशेष हैं ….
क्यूंकि
दोनों ही हालात में
आपके पास
अपना
कुछ शेष नहीं रहता ।२।

**

यूँ देखा जाये तो
प्रेम से इतर
जीवन में
कुछ होता नहीं है
प्रेम ही बनाता है
प्रेम ही बिगाड़ता है
सच कहो तो
जीवन को
प्रेम ही चलाता है ।३।

कुछ अनमने से हैं ….


 

.

परिंदे लौट कर आये हैं जब से घर को वापस

न जाने  क्या हुआ है मगर कुछ अनमने से हैं 

.

द्रौपदी ….


 

चौपड़ सज चुकी है

दुर्योधन हों या युधिष्टर

खेल ही तो खेलेंगे

कोई हारे कोई जीते

क्या फर्क पड़ता है

दांव पर तो

द्रौपदी ही है न !!!

*
(सन्दर्भ : चुनाव)

पतझड़


..

पतझड़ के आते ही
हो जाते हैं बेघर
बेचारे पत्ते ….
यूँ तो
जानते हैं
आज बिछड़े हैं तो 
कल मिलेंगे
फिर इन्हीं शाखों पे
नव किसलय बन उगेंगे
लेकिन फिर भी
पतझड़ तो पतझड़ ही है न !!!

 

 


कुछ क्षणिकाएँ …


-:-

हवाअों के खिलाफ
खड़े होना है
जरूर हो मगर
इतना जरूर जांच लेना कि
पैरों के नीचे जमीन ठोस हो
-:-

बुरे वक्त मे तो
साया भी
साथ छोड़ देता है
तुम भी कितने नादां हो
गिरगिटों पर ही भरोसा कर बैठे
-:-

मुहबब्त हो या अदावत
जो भी करो
टूट के करना ….
बाकी तो
सब ठीक ही है
बस, रिश्तों में
राजनीति मत करना
-:-

वैसे भी
रिश्तों मे राजनीति अौर
राजनीति में रिश्ते अगर
एक बार जगह करलें तो
सब तबाह ही हो जाता है
-:-

रिश्ता…


अक्सर ऐसा होता है कि हमसे हमारी अपनी बातें तो संभलती नहीं लेकिन हम दूसरों की बातों में दखल देने से बाज नहीं आते….

.

तुम्हारा किस से
क्या रिश्ता है
इसे तुम परिभाषित करो
काटो छाँटो
या चाशनी में लपेटो
मर्ज़ी हो बिखेरो
मर्ज़ी हो समेटो

लेकिन
मेरा किस से
क्या रिश्ता है
कब कहाँ …
कितना और कैसा
निभाना है
सहेजना है संवारना है
या नहीं
ये तय करने का हक़
तो मुझको ही है न !!!

.

जीने का क़र्ज


उधड़ते हुये
रिश्तों को
ढांप-ढूंप
दुनिया की नज़रों से
बचाकर …
कब तक
रफू करे कोई…..

**

जीना
अगर सलीके से हो ,
तो ठीक
वरना
जीने का क़र्ज
कब तक
अदा करे कोई…..

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