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घड़ी 

हाथ में बाँध कर 

ये मत सोचना 

कि  तुमने 

समय को बाँध लिया है 

अपनी गिरफ्त में ..

वो तो चलेगा 

अपनी ही चाल 

तुम्हे अगर 

उसके साथ चलना है तो 

कदम से कदम मिला कर चलना 

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*

बस यूँ ही एक खयाल…

काला ओर सफेद धन नहीं,  नीयत होती है 

 

या इसे यूँ भी कह सकते हैं … एक हाइकू की शक्ल में

 

धन धन है

न काला न सफेद

जो है, मन है


*

*

ए  लड़कियों सुनो 

आज विजयादशमी है 

ऐसा करो तुम भी आज से 

साक्षात् विजया बन ही जाओ 

अबला, दोयम, बेचारी और  कमजोर 

इन युगों पुराने लेबलों से खुद को  मुक्त करो 

धार लो दुर्गा का रूप, हो जाओ सिंह पर सवार 

कर डालो संहार समाज में फैले इन महिषासुरों का

ठान  लो जान लो आज से कि तुम साक्षात् विजया हो

कोई नहीं कर सकता तुम्हारा अपमान, जो करेगा वो मरेगा 

अपनी करनी, या फिर यूँ कहो कि दुष्कर्नी का फल आप भरेगा 

*

*

 

सभी को विजया दशमी की अनंत शुभकामनायें 


 

कबीर आज भी उतने ही प्रासंगिक  हैं जितने कि  आज से सैकड़ों साल पहले थे।  कबीर किसी एक व्यक्ति का नाम नहीं है, कबीर तो एक सोच है जो समाज में फैली हुयी बुराइयों का प्रतिरोध करने के लिए जन्म लेती है।

और प्रतिरोध की परंपरा सनातन है, जब जब राजनीति  में प्रतिबद्धता का क्षय अपने चरम पर पहुँचता है, तब एक कबीर का जन्म होता ही है।  दूसरे को दुर्बल और स्वयं को प्रबल घोषित करने की उत्कट इच्छा ही इस प्रतिरोध की शक्ति को जन्म देती है।

कबीर ने किसी नियम और विधा के अंतर्गत साहित्य रचने के लिए कभी कुछ नहीं कहा उन्होंने तो जो देखा, जो भोगा, अपने आस-पास जो महसूस किया उसे ही सहज सरल बोलचाल की भाषा में कह दिया, लेकिन उनकी वो दिल से निकली बातें सीधे दिलों तक पहुंची और एक विचारधारा बन गईं।  वो विचारधारा जो आंधी बन कर चली और तमाम तात्कालीन गतिरोधों के बावजूद, अपनी पूरी ताकत से समाज में व्याप्त गन्दगी को बहाकर दूर  ले गयी

एक कवि जिस सहजता और सरलता से अपनी कविता के माध्यम से बात को जन जन के मानस तक पहुँचा सकता है वो शायद और किसी माध्यम से उतना आसान नहीं, बस शर्त ये है कि कवि को खुद से ईमानदार होना चाहिये । यूं तो आज भी बहुत से ऐसे कवि हैं जिन की कविता समाज में फैली बुराइयों और कुरीतियों पर चोट करती है, लेकिन उनको राजनीतिक रंग देकर पटल से हटाने की पूरी कोशिश की जाती है ।

कबीर के समय  में भी समाज राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक सभी दृष्टियों से विघटन की ओर जा रहा था और आज भी वही हो रहा है।  आज भी समाज उसी तरह के संक्रमण के दौर से गुजर रहा है,  अव्यवस्था, भृष्टाचार कुशासन एवं अस्तव्यस्तता अनेक प्रकार के आडंबर, कुप्रथाओं एवं अंधविश्वास से बुरी तरह से घिरा हुआ है। 

कबीर युगद्रष्टा थे, उन्होने वर्ण व्यवस्था, अन्धविश्वास, धार्मिक आडम्बर जैसी कुरीतियों का विरोध करके समाज में व्याप्त द्वेष को मिटा कर साफ किया था। सच कहें तो आज फिर एक कबीरवादी विचारक की जरूरत है जो समाज मे व्याप्त गंदगी को, विसंगतियों को बिना किसी भेदभाव के हर जाति, हर वर्ग मे से धो-पोंछ कर साफ कर सके ।

सब के लिये एक बात, एक नियम और एक कायदा, इस सन्दर्भ मे  अभी हाल मे ही देखा हुआ डा. कुमार विश्वास का एक वीडियो याद आता है उसमे एक पंक्ति कही है उन्होने कि “ राजनीति का धर्म निभाओ लेकिन धर्म की राजनीति मत करो” , यह बात किसी भी लाग लपेट से परे कहीं न कहीं उसी कबीर वादी विचारधारा का ही हिस्सा लगती है। इसी सोच की, ऐसी सशक्त बानियों की आज के समय मे समाज को बहुत आवश्यकता है । हो सकता है उनकी और बहुत सी बातों में शायद मेरा मतैक्य न हो लेकिन इस बात से मैं शतप्रतिशत सहमत हूं कि राजनीति में बैठे हुये लोगों को जाति और धर्म के भेद को परे रखकर ही अपने राजनीतिक दांव पेंच चलें इसके लिये किसी खास दर्शन या शिक्षा की जरुरत नहीं है बल्कि सर्वधर्म समभाव से सबके भले की भावना हृदय में रखने भर की जरूरत है

औरतें


कई बार मैने ऐसा महसूस किया है कि सब का नहीं मगर जादातर का अभी भी देहरी के इस तरफ का सच कुछ और और उस तरफ कुछ और ही है । बस उसी सोच से उपजी है यह रचना

उन सबसे अग्रिम क्षमा चाहती हूँ जो इस सोच से इत्तेफाक नहीं रखते ।

औरतें 

पहले भी दोयम थीं 

आज भी दोयम ही हैं 

पढ़ी लिखी हों 

या बेपढ़ी

अक्सर 

देखा है कि 

घर के बाहर 

एकदम टिप-टॉप… 

स्त्री विमर्श की बातों का 

पुलंदा बांधे 

बहस मुबाहिसे के 

जिरह-बख्तर से लैस 

औरतों के हक़ पर 

जोशीला भाषण देने वाली 

टीवी और फिल्मों में 

नारी स्वातंत्र्य पर 

धधकती हुयी विचारधारा 

प्रस्तुत करने वाली औरतें भी 

मानें या न मानें

मगर जादातर

घर की दहलीज से अंदर आते ही 

दोयम के खोल मे ही

लिपट जाती हैं

……

दिन …


खट्टे दिन कुछ मीठे दिन 

कभी बर्फ के गोले दिन

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चांदी से चमकीले दिन

थोड़े से शर्मीले दिन

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छुपम छुपाई धप्पा धौल

चुहल भरे हँसबोले दिन

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खट्टी मीठी याद अगोरें

मिश्री से मिठबोले दिन

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घूँट घूँट कर पिए चाँदनी

पी कर हुए नशीले दिन

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झील किनारे चाँद ताकते

यादों के रस घोले दिन

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तपना जरूरी है

पकने के लिए 

चाहे इंसान हो

या फिर माटी…  

माटी

कच्ची रहे 

तो बह जाती है 

इंसान

कच्चा रहे 

तो  ढह जाता है 

बिना तपे या फिर 

बिना पके 

कहाँ चलता है 

जिंदगी में

अगर खरा होना है 

तो  दुखों का ताप झेल कर 

अनुभवों की भट्ठी में  

तपना तो पड़ेगा ही  न !!