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मैं चिराग़ हूँ उम्मीद का मुझे देर तक जलाए रखना
हवाएँ तो होंगी तुम हथेलियों की ओट बनाए रखना

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तूफ़ान तो होंगे ज़माने के बहुत मैं डर भी जाऊँ शायद
तू मुझे थाम के मेरे क़दमों को धरती पे जमाये रखना

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ऐ जिंदगी !

तू ही तो थी जिसने हवाओं की उँगली थाम कर चलना सिखाया 

गिरना… उठना… संभलना और फिर संभल कर चलना सिखाया 

उड़ाने दीं तो उन को जाँचना – परखना और फिर उड़ना सिखाया 

तूने ही तो सूत्र सारे हमारे हाथ में रख कर हमें हम होना सिखाया 

शुक्रिया ऐ जिंदगी शुक्रिया … !!

***

सब से बड़ी गुरू तो जिन्दगी ही है … Happy Teachers’ Day 

जड़ें…


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काश कि 

हम लौट सकें 

अपनी उन्ही जड़ों की ओर 

जहाँ जीवन शुरू होता था  

परम्पराओं के साथ 

और फलता फूलता था  

रिश्तों  के साथ 

**

मधुर मधुर मद्धम मद्धम  

पकता था  

अपनेपन की आंच में 

 मैं-मैं और-और की

 भूख से परे 

जिन्दा रहता था  

एक सम्पूर्णता 

और संतुष्टि के 

अहसास के साथ 

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काट कर पत्थर

नदी होकर जनमना

फिर ठोकरें खाते हुए

दिन रात बहना

और बहते बहते

ना जाने कितना कुछ

अच्छा – बुरा

सब समेटते जाना

और बहुत कुछ

पीछे भी छोड़ते जाना

नदी बने रहने की प्रक्रिया  में

बहुत कुछ छूट जाता है

बहुत कुछ टूट जाता है

सच….

नदी होना

आसान नहीं होता

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एक क्षणिका बस यूँ ही :

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आजका ये मौसम कुछ अनमना सा है 

धरती भी है गुमसुम अम्बर तना सा है

उलझी हुई हवाएं भारी सी चल रही हैं  

लगता है बोझ दिल पर कुछ घना सा है 

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चिड़िया  …. 

तुम सुन रही हो न 

घोंसले की 

दहलीज के बाहर 

आँधियाँ ही आँधियाँ हैं 

हर तरफ 

*

नोचने को पर तुम्हारे

उड़ रहे हैं 

गिद्ध ही गिद्ध यहाँ  

हर तरफ 

**

पैने करने होंगे 

अपने ही नाख़ून तुमको 

कोई नहीं आएगा बचाने  

मुखौटों के अंदर 

बस कायरों की 

भीड़ ही भीड़ है यहाँ 

हर तरफ 

***

सरे आम होने वाले अपराधों को लोग कैसे तमाशाई बनकर देखते रहते हैं, आखिर हमे हो क्या गया है… हम जिन्दा भी हैं या नहीं, आत्म विश्लेषण की बहुत जरूरत है 


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आँधियाँ..
ये भला
कहाँ तेज़ चलती हैं
ये तो दिए हैं
बस यूँ ही
शौकिया थरथराते हैं

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