Feeds:
Posts
Comments

.

एक क्षणिका बस यूँ ही :

-:-

आजका ये मौसम कुछ अनमना सा है 

धरती भी है गुमसुम अम्बर तना सा है

उलझी हुई हवाएं भारी सी चल रही हैं  

लगता है बोझ दिल पर कुछ घना सा है 

-:-


चिड़िया  …. 

तुम सुन रही हो न 

घोंसले की 

दहलीज के बाहर 

आँधियाँ ही आँधियाँ हैं 

हर तरफ 

*

नोचने को पर तुम्हारे

उड़ रहे हैं 

गिद्ध ही गिद्ध यहाँ  

हर तरफ 

**

पैने करने होंगे 

अपने ही नाख़ून तुमको 

कोई नहीं आएगा बचाने  

मुखौटों के अंदर 

बस कायरों की 

भीड़ ही भीड़ है यहाँ 

हर तरफ 

***

सरे आम होने वाले अपराधों को लोग कैसे तमाशाई बनकर देखते रहते हैं, आखिर हमे हो क्या गया है… हम जिन्दा भी हैं या नहीं, आत्म विश्लेषण की बहुत जरूरत है 


.

आँधियाँ..
ये भला
कहाँ तेज़ चलती हैं
ये तो दिए हैं
बस यूँ ही
शौकिया थरथराते हैं

.


 

*

मन के 

आँगन की 

दीवारों पर… 

न जाने कहाँ कहाँ 

कौन कौन सी दरार ढूंढ कर 

उग आती हैं यादें 

और धीरे धीरे 

पीपल सी जड़ें जमा लेती हैं 

फिर एक दिन 

ढह जाती है आँगन की दीवार 

और यादें दफ़न हो जाती हैं 

अपने ही बोझ तले 

*


 

.

बरस महीने दिन 

छोटे छोटे होते 

अदृश्य ही हो जाते हैं 

और मैं 

बैठी रहती हूँ 

अभी भी 

उनको उँगलियों पे 

गिनते हुए 

बार बार 

हिसाब लगाती हूँ 

मगर

जिन्दगी का गणित है कि

सही बैठता ही नहीं

.

.


-:-

मुक्त करो पंख मेरे पिजरे को  खोल दो

मेरे सपनो से जरा पहरा हटाओ तो …

आसमाँ को  छू के मैं तो तारे तोड़ लाऊंगी

एक बार प्यार से हौसला बढाओ तो …

*

 बेटों से नहीं है कम बेटी किसी बात में

सुख हो या दुःख सदा रहती हैं साथ में

वंश सिर्फ बेटे ही चलाएंगे न सोचना

भला इंदिरा थी कहाँ कम किसी बात में

*

बेटियों को बेटियां ही मानो नहीं देवियाँ

पत्थर की मूरत बनाओ नहीं बेटियां

इनसान हैं इनसान बन जीने दो …

हंसने दो रोने दो गाने मुस्कुराने दो

-:-


-:-

अपेक्षाएं

जब प्रेम से

बड़ी होने लगती हैं

तब

प्रेम धीरे धीरे

मरने लगता है

विश्वास

घटने लगता है

प्रेम में तोल-मोल

जांच-परख

घर कर लेती है

तो प्रेम

प्रेम नहीं रह जाता

विश्वास विहीन जीवन

कब असह्य हो जाता है

पता ही नहीं चलता

जब पता चलता है

तब तक

बहुत देर हो चुकी होती है

सिर्फ पछतावा ही

शेष रह जाता है

क्योंकि प्रेम

मर चुका होता है !!

-:-