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देखो…

तुम रोना मत 

मेरे घर की  दीवारें

कच्ची हैं 

तुम्हारे आंसुओं का बोझ 

ये सह नहीं पाएंगी 

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वो तो

महलों की दीवारें होती हैं 

जो न जाने कैसे

अपने अंदर 

इतनी सिसकियाँ

समेटे रहती हैं और 

फिर भी

सर ऊंचा करके

खड़ी रहती हैं 

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-:-

रिश्ते

मरते नहीं 

क़त्ल किये जाते हैं 

कभी कुछ हादसे हो जाते हैं 

जो घातक बन जाते हैं 

तो कभी कुछ 

सोच समझ कर 

ठन्डे दिमाग से

योजनाबद्ध तरीके से 

क़त्ल किये जाते हैं 

मगर

ये सच है कि 

रिश्ते मरते नहीं 

क़त्ल किये जाते हैं  !!

-:-


सिर्फ

कैलेंडर नहीं
हालात भी बदलो
नए साल में
**

लिखो
वक्त़ के माथे पर
इक नयी तहरीर
कुछ 
ऐसा करो
कि बदल सके
मौजूदा तस्वीर
नए साल में
**
सिर्फ 
कैलेंडर नहीं 
हालात भी बदलो

नए साल में

**

*

जानती हूँ

तुम

अटोगे नहीं

मेरी मुट्ठी में…

तुम तो आकाश हो

सागर हो, धरती हो

सब कुछ हो

बस

अगर नहीं हो

तो तुम  

 मेरे ‘तुम’ नहीं हो

*

अक्सर 

आते हो 

ख्वाबों की तरह 

सिमटते हो 

पलकों में 

और फिर 

न जाने कब 

ग़ुम  हो जाते हो 

जैसे 

झर गयी हो रेत 

मुट्ठी से ! 

*


.

कुछ दिन पहले एक चर्चा पढ़ी थी तुकांत और अतुकांत कविता के बारे में,  तो मन में एक विचार आया कि आखिर कविता कैसी होनी चाहिए, क्या तुकांत होना ही कविता की जरुरी शर्त है 

कविता तुकांत होनी चाहिए या अतुकांत ? इस पर सबके अपने अपने विचार हैं। … क्या तुकांत होना या फिर उसमे लय और गेयता होना मात्र ही कविता  होने की निशानी है, जो तुकांत नहीं  वो कविता नहीं , इस विचारधारा से मैं  इत्तेफ़ाक नहीं रखती।  मेरा मानना है कि  फूल पत्ती, पौधे, पेड़  ….  फूल पत्ती, पौधे, पेड़  ही  रहते हैं चाहे वो घर के आँगन में हों, गमले में हों, बोन्साई में हों या जंगल में हों  …  उनके रंग रूप, खुशबू साइज़ आदि में तो फर्क  हो सकता है लेकिन वो रहेंगे तो फूल पत्ती, पौधे, पेड़  ही न  … बस ऐसे ही कविता रहेगी  तो कविता ही चाहे  तुकांत हो या अतुकांत, छंद बद्ध हो या न हो।  

कविता में तुकांत या अतुकांत से जादा  सहज प्रवाह और भाव पक्ष पर जोर होना  चाहिए। कविता होने की सबसे जरुरी शर्त होनी चाहिए प्रभावी सम्प्रेषण, पाठक से सहज संवाद स्थापित कर पाने की क्षमता और सहज प्रवाह, कविता में यदि सहज प्रवाह नहीं है, वो बीच बीच में टूटती सी लगती है तो उसे कविता न कह कर गद्य कहा जा सकता है। छंदबद्ध या तुकांत और गीत कविता का इतिहास बहुत पुराना एवं समृद्ध है और  इस बात में कोई संदेह नहीं  कि छंदबद्ध कविता लिखना बहुत मुश्किल काम है, इसके लिए बहुत साधना की  जरुरत है , नियम कायदे में बंध  कर अपने भावों को मूल रूप में प्रस्तुत कर पाना आसान नहीं होता ।  इसके उलट अतुकांत कविता में रचनाकार अपने भावों के सहज प्रवाह के साथ बहाव में बहता चला जाता है, उसको मात्रा एवं नियमों के बंधन का पालन नहीं करना होता लेकिन इसका यह मतलब बिलकुल भी नहीं कि अतुकांत कविता कविता ही नहीं होती। अतुकांत कविता में भी एक प्रवाह होता है सार्थकता होती है।  

बहुत सी अतुकांत कवितायेँ हैं जो बेहद सार्थक, सशक्त हैं जिनको पढ़ते हुए पाठक उनके सहज प्रवाह के साथ यूँ बहता चला जाता है कि उसे कविता के तुकांत या अतुकांत होने का मुद्दा पल भर को भी याद नहीं आता और न ही उसको कविता में लय का न होना अखरता है,  वो तो कविता के अर्थ एवं भाव में पूरी तरह से डूब जाता है।  

उदहारण के तौर पर मृदुला प्रधान जी की यह छोटी कविता अतुकांत होते हुए भी पूर्ण रूप से कविता ही है और पाठक को कहीं भी यह सोचने का अवसर नहीं देती कि क्योंकि यह तुकांत नहीं है अतः यह कविता नहीं है 

“निकले हुये हैं 
भयावह सर्पों के 
समूह
तफ़रीह के लिये..
ऐसे में 
कंघी,पाउडर,लिपस्टिक
रखो न रखो
सतर्क,सशक्त,सुदृढ़
साहस..
ज़रूर रख लेना
पर्स में 
घर से निकलते हुये.. 
……  
साड़ी में फ़ॉल लगाते हुये..
सुई के धागों में 
उलझता-सुलझता हुआ 
मेरा मन 
सपनों के टाँके 
लगाता रहा ..
और मैं..समय को 
दोनों हाथों से 
पकड़कर 
मिलाती रही ..
जोड़ती रही ..
 .

(अतुकांत कविता के कुछ और सुन्दर उदाहरण डॉ श्याम गुप्त जी के लेख से  साभार )

.

” गणनायक की कृपादृष्टि को ,
माँ वाणी ने दिया सहारा।
खुले कपाट बुद्धि के जब, तब-
हुए शब्द-अक्षर संयोजित;
पायी शक्ति लेखनी ने फिर 
—————– 
” नए तत्व नित मनुज बनाता ,
जीवन कठिन प्रकृति दोहन से।
अंतरिक्ष आकाश प्रकृति में,
तत्व, भावना, अहं व ऊर्जा ;
के नवीन नित असत कर्म से,
भार धरा पर बढ़ता जाता।।”
इन कविताओं में इनका अतुकांत होना कहीं भी कविता के भाव एवं  सौंदर्य के आड़े आया हो ऐसा नहीं लगता।  
हाँ,  वैसे  इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि आजकल अतुकांत कविता के नाम पर कुछ भी परोसा जा रहा है और कुछ प्रयोग तो इतने अबूझ हैं कि पाठक बेचारा सर धुनता रह जाता है मगर क्या मजाल कि कविता का सर-पैर कुछ भी पल्ले पड़ जाये।  लेकिन सिर्फ इस बात के आधार पर अच्छी अतुकांत कविता को साहित्य की मुख्य धारा से न तो निकाला ही जा सकता है और न ही उसका मजाक उड़ा कर उसको किसी भी तुकांत कविता की तुलना में काम आँका जाना चाहिए।  कविता को उसकी गुणवत्ता एवं प्रभाव के आधार पर ही आँका जाना चाहिए

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मिट्टी के घरौंदों को क्या आंधी से डराता है 

ये तो वो हैं, जिन्हें तूफ़ान हर रोज  जगाता है 

..

टूटेंगे बिखरेंगे..  और फिर से बनेंगे 

फितरत है ये इनकी गिर गिर के उठेंगे

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घड़ी 

हाथ में बाँध कर 

ये मत सोचना 

कि  तुमने 

समय को बाँध लिया है 

अपनी गिरफ्त में ..

वो तो चलेगा 

अपनी ही चाल 

तुम्हे अगर 

उसके साथ चलना है तो 

कदम से कदम मिला कर चलना 

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