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तपना जरूरी है

पकने के लिए 

चाहे इंसान हो

या फिर माटी…  

माटी

कच्ची रहे 

तो बह जाती है 

इंसान

कच्चा रहे 

तो  ढह जाता है 

बिना तपे या फिर 

बिना पके 

कहाँ चलता है 

जिंदगी में

अगर खरा होना है 

तो  दुखों का ताप झेल कर 

अनुभवों की भट्ठी में  

तपना तो पड़ेगा ही  न !! 


 

सूरज 

जब थक जाता है 

शाम के काँधे पर 

सिर रख कर सो जाता है 

रात चुपके से

उढ़ा देती है 

तारों जड़ी चुनरी

लगा देती है 

चाँद का सिरहाना 


भारत की डिजिटल क्रांति के जनक श्री राजीव गाँधी को उनकी पुण्य तिथि पर भावभीनी श्रद्धांजलि !!

आज हर ओर डिजिटल इंडिया के जयघोष की गूँज के बीच हम एक उस सबसे महत्त्वपूर्ण इंसान को भूल गए जिसने भारत में इस डिजिटल क्रांति का बीज बोया था । आज हम सब टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में भारत के बढ़ते हुए क़दमों को लेकर बहुत खुश हैं, होना भी चाहिए …. आज इस क्षेत्र में भारत जिस ऊंचाई पर खड़ा है वह सचमुच गर्व करने योग्य बात है। 

आज शायद बहुत से लोगों को यह याद भी नहीं कि आज से लगभग ढाई दशक पहले जब श्री राजीव गांधी ने देश में कंप्यूटर युग की क्रांति का शंखनाद किया था तो क्या नेता क्या जनता, सबने एक स्वर में इसका पुरजोर विरोध किया था यह कहते हुए कि यह देश को गर्त में डुबाने की साजिश है, जनता के साथ धोखा है। हर जगह लगभग हर दफ्तर के हर विभाग में यूनियन के लीडर इसका विरोध कर रहे थे, सबके मन में यह डर भरने की कोशिश कर रहे थे कि अगर कंप्यूटर आ गया हमारे देश में, तो हम सब बेरोजगार हो जायेंगे, एक एक कंप्यूटर १०-१० लोगों का या इससे भी ज्यादा का काम करेगा तो हमें कौन पूछेगा। इस लिए सबको एकसाथ मिलकर डटकर इसका विरोध करना चाहिए और किसी भी कीमत पर देश में कम्प्यूटरीकरण नहीं होने देना चाहिए। इस विरोध की लहर एक दो जगह नहीं बल्कि पूरे देश में थी और बहुत जबरदस्त थी। 

लेकिन राजीव जी ने अपनी दूरदर्शिता का परिचय देते हुए सारे विरोध के बावजूद हार नहीं मानी और देश में कंप्यूटर क्रांति का बीज बोया। शायद वो उस समय भविष्य को साफ साफ देख पाये थे कि आने वाला कल किस दिशा में करवट लेने वाला है। उन्होंने शायद यह जान लिया था कि भविष्य में सबके बराबर या सबसे आगे बढ़ कर खड़े होने के लिए देश को कंप्यूटर के युग में प्रवेश करना ही होगा। और उनके उस कदम के सुखद परिणाम आज हमारे सामने हैं । हालाँकि ऐसा भी नहीं है कि आज हमारा देश IT के क्षेत्र में जिस मुकाम पर है उसका सारा श्रेय सिर्फ और सिर्फ राजीव जी को ही जाता है, बिलकुल नहीं उन्होंने तो सिर्फ शुरुआत की थी …. उसके बाद उस तकनीकी क्रांति को यहाँ तक पहुँचाने में दशकों की मेहनत और बहुत से लोगों द्वारा सही और सामयिक निर्णयों का ही हाथ ज्यादा है। लेकिन इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि उनके उस सही समय पर सही दिशा में उठाये हुए कदम ने इस डिजिटल क्रांति के लिए नींव के पत्थर का काम किया है। लेकिन आज के राजनितिक परिप्रेक्ष्य में कोई भी किसी भी दल का छोटा या बड़ा एक भी नेता ऐसा नहीं है जो राजीव गांधी के इस अभूतपूर्व योगदान के लिए उनको जरा सा भी श्रेय देता हो या देना चाहता हो । कोई इस बारे में बात नहीं करता है , सब हम, हम मैं मैं में लगे हुए हैं। 

आज यहाँ सिलिकान वैली मे भारतीयों का वर्चस्व देखकर बहुत अच्छा लगता है, एक बार पुन: भारत की डिजिटल क्रांति के जनक को उनकी पुण्य तिथि पर भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करती हूँ


आजकल ये जो एक नया ट्रेंड आ गया है किंग मेकर्स का यह देश के लिये घातक हो सकता है।  आजकल देखने में आ रहा है  कि चुनाव दरअसल नेताओं का काम नहीं रह गया है बल्कि पार्टियों के द्वारा नियुक्त किये गए कुछ पढ़े लिखे कुशल प्रबंधकों का दिमागी खेल बन कर रह गया है।  इस नये ट्रेंड में जो ये  मार्केटिंग और प्रबंधन के कुशल लोग अपने नियोक्ता के लिए काम करते हैं,  बहुत अच्छा करते हैं, लेकिन एक सवाल जो इन्हें  खुद से पूछना चाहिए वो ये कि क्या वे अपनी शिक्षा का उपयोग देश के भले के लिये कर रहे हैं ? नहीं !!  क्योंकि उनका सही मायनों मे नेतृत्व से, या पार्टी की विचारधारा से कुछ लेना देना नहीं होता वे तो अपनी कुशलता के बूते पर बस अपने नियोक्ता के पक्ष में एक ऐसा माहौल तैयार करने का काम करते हैं जो साधारण जनमानस के सोचने समझने की शक्ति पर धुंध की तरह छा जाता है, मतदाता वही करता है जो ये उससे करवाना चाहते हैं।  ये एक तरह से सम्मोहन जैसा वातावरण निर्मित कर देते हाँ और बेचारी जनता उस जाल में फंस जाती है और मजे की बात तो ये कि ख़ुशी ख़ुशी फंसती हैं, स्वयं को कम से कम उस समय तो ठगा हुआ भी नहीं महसूस करती ।  

लेकिन यकीन जानिये ये सिर्फ और सिर्फ अच्छे मैनेजर हैं और नियोक्ता बदलते ही इनकी वफ़ादारी नए नियोक्ता के साथ हो जाती है। प्रशान्त  इस तरह का एक उदाहरण हमारे सामने है ही, जिसने एक से अधिक नियोक्ता पार्टियों के लिये काम किया । लेकिन इस खेल में जनता बेचारी बलि का बकरा बन जाती है

हाँ यदि ये कुशल एवं समर्थ लोग केवल नौकरी की तरह ये काम न करके  पार्टी का हिस्सा बनें, उसकी विचारधारा से जुड़ें तो बात और है, इन पढ़े लिखे लोगों की यदि नेतृत्व क्षमता का लाभ भी देश को भी मिले तो जरूर बहुत अच्छे नतीजे हो सकते हैं

यह एक विचारणीय प्रश्न है, सोचिये, समझिये और फिर कोई हल निकालिये । क्योंकि जिनके मुँह सत्ता का खून लग चुका है वो तो येन केन प्रकारेण सत्ता को हथियाने का प्रयास करेंगे ही, फिर वो चाहे पक्ष मे बेठे हों या विपक्ष में…फैसला जनता को यानि कि आप को करना है कि आप अपने देश के साथ क्या करना चाहते हैं । 

शायद अब समय आ गया है कि राजनीति के तौर तरीकों मे कुछ बदलाव किये जाएँ और पात्रता की योग्यता के लिये मानदंड निर्धारित किये जाएँ, और शैक्षणिक एवं चारित्रिक योग्यता के आधार पर उम्मीदवारों चुनाव में खड़े होने की अनुमति प्रदान की जाये। बस अब बहुत हो गयी मनमानी, परिवारवाद और भाई-भतीजावाद… अब एक साफ सुथरी राजनीति का खाका तैयार करने की जरूरत है जो सिर्फ और सिर्फ देश हित की भावना को सर्वोपरि रख कर काम करे

-:-


1.

परिंदे नहीं 
पर उड़ान तो है 
सपनों में भी 

2.

जाँचों ज़रूर
उड़ान से पहले 
हवा का रूख 

3.

भूलना मत 
उड़ान से पहले 
पर तौलना 

4.

भरो उड़ान 
नापो आकाश, गर 
पंख साथ दें 

5.

उड़ान ही तो 
नहीं है सब कुछ
ज़िंदगी भी है 

-:-

ये हाइकू सरस्वती माथुर जी के चित्र “उड़ान” से प्रेरित


आज

भेजी है एक पाती

हवाओं के हाथ

सपनों के साथ

आओगे न….

चलो तब तक

मैं

जिंदगी की दहलीज पर

खुशियों की

रंगोली भी सजालूँ

आरती के थाल में

कुछ मुस्कानें भी जगालूँ

कुछ अपने

कुछ बेगाने भी बुलालूँ

कुछ चहल-पहल तो हो

ताकि तुम आओ

तो घर घर सा लगे

वर्ना बहुत बरसों से

ये ख़ामोशी में लिपटे

किसी भूत बंगले से

कम नहीं था

तुम्हारे बिना यहाँ

दीवारें दरवाजें खिड़कियां

सब थे

बस एक घर ही नहीं था !!


एक सपना

जो आँखों की

दहलीज तक

आते आते

ठिठक जाता है

आँखें ताउम्र

इंतज़ार करती हैं

उसी बेमुरव्वत का

ये भी भला

कोई बात हुयी

ऐसा भी इश्क़ क्या….

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