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एक अरब से भी

अधिक लोग

जिनकी मुट्ठी में

देश की किस्मत कैद है…

क्या इतने बेचारे हैं

कि यहाँ चंद ख़ूनी भेड़िये

अपना नफरत का खेल खेलते हैं

और बाकी लोग,

बस तमाशा देखते हैं

थोड़ा रोना गाना

थोड़ा हो हल्ला करते हैं

फिर रोजमर्रा की

ज़िंदगी में रम जाते हैं

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घर बनाओ

मकान नहीं…

घर हमें जिन्दा रखता है

प्यार देता है, दुलार देता है

अपनेपन का अहसास देता है

दुखों की धूप हो तो छाँव देता है

रोने को मन हो तो इक ठाँव देता है

पर मकान इंसान को कुछ और नहीं देता

बस कर्ज का बोझ और थोड़ा अभिमान देता है

केंचुए…


-:-

काट दिये पर 

 सिल दी गयीं जुबानें 

और आँखों पर पट्टी भी बाँध दी

इस सबके बाद दे दी हाथ में कलम 

कि लो अब लिखो निष्पक्ष हो कर 

तुम्हारा फैसला जो भी हो 

बेझिझक लिखना 

-:- 

 गूंगे बहरे लाचार 

आपके रहमो करम पर जिन्दा लोग 

क्या मजाल कि जाएँ आपके खिलाफ 

ऐसी जुर्रत भी करें हमारी मति मारी गई है क्या 

हुजूर माई बाप आप की दया है तो हम हैं 

आप का जलवा सदा कायम रहे और

हमारे कांधों पर पाँव रख कर 

आप अपना परचम लहरायें 

विश्व विजयी कहलाएँ 

-:-

हम तो बस

 सदियों से यूँ ही  

तालियाँ बजाते आये हैं 

 आगे भी वही करेंगे राजा चाहे जो हो  

हमें क्या, भूखे प्यासे रोयेंगे तड़पेंगे 

मगर राजा की जय बोलेंगे  

और हक़ नहीं भीख के 

टुकड़ों पर पलेंगे 

-:-

जब जी चाहे 

पुचकारो मतलब निकालो 

फिर गाली दे कर हकाल दो 

हम इंसान कहाँ कुत्ते हैं 

दर असल हम कुत्ते भी नहीं 

वो भी कभी कभी भौंक कर काट लेते हैं

हम तो उस से भी गये गुजरे

रीढ़ विहीन, शायद

केंचुए हैं

-:-


-:-

मैं चिराग़ हूँ उम्मीद का मुझे देर तक जलाए रखना
हवाएँ तो होंगी तुम हथेलियों की ओट बनाए रखना

-:-

तूफ़ान तो होंगे ज़माने में बहुत मैं डर भी जाऊँ शायद
तू मुझे थाम के मेरे क़दमों को धरती पे जमाये रखना

-:-


ऐ जिंदगी !

तू ही तो थी जिसने हवाओं की उँगली थाम कर चलना सिखाया 

गिरना… उठना… संभलना और फिर संभल कर चलना सिखाया 

उड़ाने दीं तो उन को जाँचना – परखना और फिर उड़ना सिखाया 

तूने ही तो सूत्र सारे हमारे हाथ में रख कर हमें हम होना सिखाया 

शुक्रिया ऐ जिंदगी शुक्रिया … !!

***

सब से बड़ी गुरू तो जिन्दगी ही है … Happy Teachers’ Day 

जड़ें…


**

काश कि 

हम लौट सकें 

अपनी उन्ही जड़ों की ओर 

जहाँ जीवन शुरू होता था  

परम्पराओं के साथ 

और फलता फूलता था  

रिश्तों  के साथ 

**

मधुर मधुर मद्धम मद्धम  

पकता था  

अपनेपन की आंच में 

 मैं-मैं और-और की

 भूख से परे 

जिन्दा रहता था  

एक सम्पूर्णता 

और संतुष्टि के 

अहसास के साथ 

**


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काट कर पत्थर

नदी होकर जनमना

फिर ठोकरें खाते हुए

दिन रात बहना

और बहते बहते

ना जाने कितना कुछ

अच्छा – बुरा

सब समेटते जाना

और बहुत कुछ

पीछे भी छोड़ते जाना

नदी बने रहने की प्रक्रिया  में

बहुत कुछ छूट जाता है

बहुत कुछ टूट जाता है

सच….

नदी होना

आसान नहीं होता

.

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