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एक परी थी…..   

छोटे छोटे  सपने बुनकर 

आँखों में पहना देती थी 

उसकी बातों मे जादू था

उसके हाथों में जादू था,

बची हुयी कतरन से भी वो 

गुड़िया नयी बना देती थी 

एक परी थी…..

मैं रोऊँ वो उसके पहले 

चेहरे पे मुस्कान सजा के 

चूमचाम कर फूंक मार कर 

मेरी चोट भुला देती थी 

अपनी प्यारी बातों से वो 

मेरा मन बहला देती थी 

एक परी थी…..

एक रोज़  फिर आंधी आई 

और – परी को उड़ा ले गयी 

मेरे अंदर की बच्ची को 

जीवन भर की सजा दे गयी 

रोज रात को ढूंढ रहीं हूँ 

सपना सपना तारे तारे 

कोई तो हो एक बार जो 

मुझसे मेरी परी मिला दे 

एक परी थी…..

-:-

मेरी माँ मेरी परी… आज एक साल और बीत गया… Miss you mom .. Love you 

 


बापू 

अच्छा ही हुआ 

जो आप नहीं हैं आज 

अगर होते तो 

रो रहे होते खून के आंसू 

गणतंत्र को गनतंत्र बना देने वाले 

क्या रत्ती भर भी समझ पाये हैं 

आपके स्वराज का अर्थ …

नहीं वो तो बस नाम को 

चढ़ा देते हैं चार फूल 

राजघाट पर और 

कर लेते हैं फर्ज पूरा 

दुनिया को दिखाने को 

कि बापू आज भी हमारी यादों में हैं 

जबकि असलियत तो ये है कि 

आप उनकी यादों में नहीं 

सिर्फ जेबों में रह गए हैं 

नोटों पर छपी रंगीन तस्वीर बन कर

… 

( “गणतंत्र / गनतंत्र” शब्द मित्र कवि कमलेश शर्मा जी की पोस्ट पर पढ़ा था, इस अद्बभुत खयाल का श्रेय उनको ही जाता है, उनको धन्यवाद सहित उनकी पोस्ट  से साभार )

कभी तो उगेगा 

सच का सूरज  

और बढ़ेगा 

रौशनी का कद 

फिर देखना 

ये अँधेरे कैसे डूबते हैं 

अपने ही विस्तार में 

तब ढूंढें  से भी

नहीं मिलेगा 

इनके वजूद का 

जरा सा अंश 

और तब

तुम चमकना 

अपनी पूरी उजास के साथ 

आज नहीं तो न सही 

कोई बात नहीं

पर  वो सुबह  

कभी न कभी तो

जरूर आएगी !!!!

 

माँ की दुआ
बंधीं रहती है
ताबीज सी दिल में
बच्चों के साथ
वो चाहे कहीं भी हो
जब जरा मन उदास हुआ
इक प्यार भरी
थपकी सी लगा देती है
माँ की याद !!


..

आज सच में बस एक क्षण भर की क्षणिका …..  इतने में  ही लगा बात पूरी हो गयी , जैसे खाने मे नमक , न कम न जादा बस एकदम सही स्वादानुसार :-) 

-:-

यूँ भी हो कभी 

कुछ  तुम कहो न हम 

बस मौन बोले 

और मन.. 

बरसों के जंग लगे 

ताले खोले 

-:-

 


1 जनवरी से वाहनों पर लागू होगा सम विषम का नियम 

.

मैं समझ नहीं पा रही हूँ कि एक अच्छे फैसले का इतना विरोध क्यों हो रहा है। हम सिर्फ़ प्रदूषण की बात करते हैं लेकिन कोई कारगर उपाय नहीं करते हैं ।

कोई कुछ अच्छा करने की कोशिश करे तो हम उसमे रोड़ा अटकाने की कोशिश जरूर करेंगे। अब कैन्सर को दूर करने के लिए शल्य चिकित्सा की ही ज़रूरत होती है, हमेशा दवाई की गोली मीठी तो नहीं हो सकती ना।

देखा जाये तो इस फैसले से सरकार को तो कठिनाइयां ही आने वाली हैं, सरकार यह जानते हुए भी कि लोग उसके विरूद्ध हो सकते हैं यह जोखिम भरा फैसला जनता के भले के लिए ही ले रही है।

प्रदूषण कम होगा तो बीमारियां कम होंगी, दवा-इलाज की जरुरत कम होगी, खर्चे कम होंगे। संक्षिप्त में कहूँ तो मैं व्यक्तिगत रूप से दिल्ली सरकार के इस फ़ैसले का अनुमोदन करती हूँ। हाँ ये मानती हूँ कि इस नियम का पालन करवा पाना आसान नहीं होगा। लेकिन यदि हम सब चाहेंगे तो ये जरूर होगा।

आस-पास के लोग मिल कर बारी बारी से अपना वाहन प्रयोग कर सकते हैं, एक गाड़ी में एक व्यक्ति अकेले जाने के बजाये एक साथ चार पांच लोग मिलकर जा सकते हैं इस तरह से पब्लिक यातायात साधनों पर एकदम से जादा बोझ भी नहीं बढ़ेगा।

 अमेरिका में कार पूलिंग का सिस्टम है जिसमें चार-पांच लोग मिल कर साथ जाते हैं, बारी बारी से अपनी कार निकालते हैं। हर दिन ड्राइविंग का टेंशन भी नहीं होता, प्रदूषण कम होता है और पैसे की बचत भी होती है । सच कहें तो समय की भी बहुत बचत होती है, यहाँ सप्ताह में 5 दिन स्कूल होता है, बच्चों को स्कूल छोड़ने और वापस लाने के लिए जादातर 4-5 बच्चे एक साथ जाते हैं इस तरह हर अभिभावक को सप्ताह में एक ही दिन जाना पड़ता है।

हमे चाहिये कि हम सरकार के इस कदम को सफल बनाने मे साथ दें। चाह होगी तो राह भी निकल ही आयेगी

.

.

भीड़


.

आज हर तरफ

इक हंगामा सा बरपा है 

इक भीड़  है जो 

बदहवास सी चली जा रही  

कोई कुछ जानता नहीं और 

कोई कुछ  पूछता भी नहीं 

बस.. सब यही सोच कर 

भीड़ के साथ बढे चले जा रहे हैं 

कि  कुछ तो हुआ ही होगा 

जो ये सब लोग यूँ जुट पड़े हैं 

लेकिन मजे की बात तो ये है 

सब यही सोच कर जुटे हुए हैं 

और अब 

भीड़ से अलग हट कर 

सोचने से डरते हैं 

कहीं लोग पागल न कहने लगें …

-:-

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