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अशोक चक्रधर जी की रचनाएँ पढ़ना और सुनना एक बहुत सुंदर अनुभव है। मैंने डॉक्टर रेशमा के ब्लॉग पर पढ़ा तो आप सब दोस्तों से शेयर किए बिना नहीं रह सकी …

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जंगल गाथा

एक नन्हा मेमना
और उसकी माँ बकरी,
जा रहे थे जंगल में
राह थी संकरी।
अचानक सामने से आ गया एक शेर,
लेकिन अब तो
हो चुकी थी बहुत देर।
भागने का नहीं था कोई भी रास्ता,
बकरी और मेमने की हालत खस्ता।
उधर शेर के कदम धरती नापें,
इधर ये दोनों थर-थर कापें।
अब तो शेर आ गया एकदम सामने,
बकरी लगी जैसे-जैसे
बच्चे को थामने।
छिटककर बोला बकरी का बच्चा-
शेर अंकल!
क्या तुम हमें खा जाओगे
एकदम कच्चा?
शेर मुस्कुराया,
उसने अपना भारी पंजा
मेमने के सिर पर फिराया।
बोला-
हे बकरी – कुल गौरव,
आयुष्मान भव!
दीर्घायु भव!
चिरायु भव!
कर कलरव!
हो उत्सव!
साबुत रहें तेरे सब अवयव।
आशीष देता ये पशु-पुंगव-शेर,
कि अब नहीं होगा कोई अंधेरा
उछलो, कूदो, नाचो
और जियो हँसते-हँसते
अच्छा बकरी मैया नमस्ते!
इतना कहकर शेर कर गया प्रस्थान,
बकरी हैरान-
बेटा ताज्जुब है,
भला ये शेर किसी…

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डॅा. रेशमा हिंगोरानी की एक बहुत ही आवश्यक और ज्ञानवर्धक पोस्ट…

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कुछ मूल जानकारी:

  1. तलफ़्फ़ुज़: शब्दार्थ – उच्चारण, मुंह से शब्द निकालना।
  2. नुक़्ता:
    • अरबी लफ़्ज़, देवनागरी, गुरमुखी और अन्य लिपियों में किसी व्यंजन अक्षर के नीचे लगाए जाने वाला बिंदु
    • जैसे ‘ज’ के नीचे नुक़्ता लगाने से ‘ज़’ बन जाता है और ‘ड’ के नीचे नुक़्ता लगाने से ‘ड़’ बन जाता है।
  3. नुक़्ते का प्रयोग:
    • उर्दू, अरबी, फ़ारसी ज़ुबानों से हिंदी भाषा में आएवर्णों को अलग से बताने के लिए इस्तेमाल किया जाता है जैसे: क, ख, ग, ज, फ।
    • नुक़्ते के बिना इन भाषाओं से लिए गए शब्दों को हिंदी में सही से उच्चारित नहीं किया जा सकता।
  4. क, ख, ग में नुक़्ते का प्रयोग हिंदी भाषा में अनिवार्य नहीं है परन्तु ‘ज़’ और ‘फ़’ में नुक़्ता लगाना आवश्यक है।
  5. कोई भी ज़ुबान सही से बोली जाए, तभी उसकी ख़ूबसूरती निखर कर आती है।
  6. मगर उर्दू ज़ुबान में सही तलफ़्फुज़ की एहमियत का अंदाज़ा आप इन शब्द…

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वीरान सड़कें 

टी वी से चिपक कर 

बैठे हुए लोग 

बढ़ती महामारी के 

बदलते आंकड़ों पर 

गिद्ध सी नज़र।  

कल तक जो आदमी 

दुनिया को मुट्ठी में समेट 

हवाओं में उड़ता था  

कितना बेचारा है आज 

चाँद की तो कौन कहे 

धरती पर भी  

घर की दहलीज़ के बाहर 

पाँव रखने से डरता है 

लेकिन 

शायद अभी भी 

दिमाग़ ठिकाने पर नहीं है   

इतनी तबाही देख ली मगर 

जाति धर्म और राजनीति के 

पचड़ों में अभी भी उलझा हुआ है 

न जाने 

कब सीखेगा  

इंसानियत की भाषा 

2017


हिन्दी हाइकु(HINDI HAIKU)-'हाइकु कविताओं की वेब पत्रिका'-2010 से प्रकाशित हो रही है। आपकी हाइकु कविताओं का स्वागत है !

1-मंजु मिश्रा

1.

सर्दी ने छीने 

जो पेड़ों के गहने 

लाया वसंत 

 2.

तितलियों ने 

वासंती खत लिखे 

मौसम के नाम

 3.

सर्दी की भोर

चमकतीं हीरे सी  

ओस की बूँदें 

 4.

रात रोई थी 

चमक रहे दूब पे 

ओस- से आँसू  

 5.

लाया वसंत 

खुशियों की हट 

बिखरे रंग 

6.

उड़ते ख्वाब 

हवा की डोरी  संग 

जैसे पतंग 

 7.

ढल रहा है 

सागर की गोद मे 

थकासा सूर्य

 8.

पुल के पार 

डूब रही है साँझ 

लाल सिंदूरी

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कोरोना के भय ने सारे समीकरण उल्टे-पुल्टे कर दिए हैं । अब देखिए न कहाँ तो लोगों को हिल-मिल कर साथ-साथ रहने को कहा जाता था और आज सबको सोशल डिस्टेंसिंग रखने को कहा जा रहा है,  एक दूसरे से दूर-दूर रहने की हिदायत दी जा रही है । इसी जमीन पर यह एक शेर बना है…

जऱा सा फ़सला रखिए जनाब हर किसी से 

बहुत नजदीक अाएँगे तो साँसे रूठ जाएँगी

Stay Home, Be Safe, Protest Yourself and Protect Community

 


मुश्किलें 

हों तो क्या 

हमने 

अपनी मुट्ठी में 

जो उम्मीदें बाँध रखी हैं 

उन्हें जिन्दा रहने के लिए 

साँसों की गर्मी और 

आसुंओं की नमी दी है ….

देखना

इनमे एक दिन 

अंकुर फूटेंगे और 

ये परवान भी चढ़ेंगी 

और फिर 

सूरज के दरवाजे पर 

दस्तक देंगी 

उस दिन दूर होगा अंधेरा !!

___



सपने 

ख़ुद नहीं बनते

उन्हें  बीजना पड़ता है 

फिर सींचना पड़ता है 

उम्मीद की बारिश में

 कभी – कभी तो 

पूरा जीवन बीत जाता है 

उन्हें पोसते पोसते 

लेकिन अंकुर नहीं फूटते

शायद जिन्दगी जीने का  

हुनर ही भूल गए …

 


.

ग़लत या सही

शायद ऐसा

कुछ होता ही  नहीं

होता है तो बस

परिस्थितियों को

अपने अपने ढंग से

देखने का नज़रिया 

लेकिन फिर भी

जब अन्दर ही अन्दर

कुछ टूटने सा लगता है

और, आस-पास

कोई नहीं होता

उस पीड़ा को

बाँटने के लिए

तो लगता है

हम नाहक ही जिए

कौन है अपना

क्या व्यर्थ ही भागते रहे

रिश्तों के लिए

.
 

.

एक बात कहें 

हमने ये जो ज़रा सा 

खुला आसमान देखा है न  

इसके लिए हमने 

बहुत जद्दोज़हद की है

वर्ना  तुमने तो 

पर उगने से पहले ही 

हमें जिबह करने में 

कोई कसर कहाँ छोड़ी थी

खैर

कोई बात नहीं 

बरसों से जमे ग्लेशियर 

अब पिघल गए हैं 

हमारे ऊपर की सब बर्फ 

बह गई है

धूप भी निकल आई है

हमारे परों में भी 

नई जान आई ही समझो 

ज़रा ठहरो 

फिर देखना हमारी परवाज़ 

हमारी मंज़िल आसमान है 

.

.