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आइए आज एक लघु कथा पढ़ते हैं ….

संजीवनी तो बस एकटक छत को घूरते हुए सोचे जा रही थीं कि अब तक वो इतनी अन्धी कैसे बनी रहीं, आज जब उनकी आँखें खुली थीं तो उनके आँसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे, आज ही तो सही मायने मे वे  जान पाई थीं कौन अपना है और कौन पराया।

बात तो बस हँसी मजाक मे ही शुरू हुई थी, लेकिन इतना बिगड़ जाएगी ये कहाँ किसी ने सोचा था। बिट्टी, उनकी तबियत खराब है सुनकर उनको देखने के लिए अपने ससुराल से आई हुई थी। यूँ ही बातों- बातों में उसने कहा “अम्मा तुम तो मेरा और भैया का हिस्सा- बाँट अपने हाथों ही कर दो, क्या फ़ायदा कि तुम्हारे बाद हम भाई- बहन के बीच लड़ाई झगड़ा हो” – उन्होने भी हँसते हुए ही कहा, अरे बिट्टी काहे की हिस्सा बाँट, तू तो ले गई अपना हिस्सा तेरे ब्याह में, अब तो जो है ,सब रज्जू  का है। हाँ भाई तेरा जो चाहे सो करे, वह तुम दोनों के बीच की बात… और हँसती रहीं। मगर पता नहीं बिट्टी को क्या हुआ कि एकदम गुस्से में आ गई और बोली, ऐ अम्मा तुम क्या समझती हो, तुम सब भैया को सौंप दोगी और मैं चुप बैठी रहूँगी, तुम इस गलत फहमी मे ना  रहना। आजकल बेटा बेटी दोनो का बराबर का हिस्सा होता है, तुमने न दिया ,तो मैं कोर्ट कचहरी तक जाऊँगी, मगर ऐसे ही अपना हिस्सा थोड़े छोड़ दूँगी।  वे तो अवाक् रह गईं थी यह बात सुनकर।  सब थोड़ी देर तो सन्न से बैठे रहे उसके बाद ममता ने खाना लगाया लेकिन सब बिना खाए-पिए ही अपने अपने कमरों में चले गए ।

वह अपने बिस्तर पर  मानो सकते की मारी-सी बैठी थीं और सोच रही थी कि ये सब क्या हो गया, आखिर कहाँ गलती हो गयी उनसे ….  इतने में उनकी बहू ममता उनके कमरे में आई और उनका हाथ पकड़ कर सहलाते हुए बोली “अरे अम्मा जी आप काहे को चिन्ता करती हैं, तबियत और खराब हो जाएगी आपकी।  मान लीजिए न जीजी की बात, वह जो कह रही हैं।  आप तो बस जल्दी से  ठीक हो जाएँ और बबली और चिंटू  के साथ खेलें , हमारे सर पे आपका साया रहे, हमें इस से जादा क्या  चाहिए। आपका आशीर्वाद बना रहे हमें कौन- सी कमी है। वे उसका मुँह देखती रहीं और उसे गले लगाकर बोलीं  “अच्छा जा अब रात बहुत हो गई सो जा, बच्चे भी राह देख रहे होंगे तेरी।”

ममता के जाते ही वे फूट-फूटकर रो पड़ीं, यही सोच सोचकर उनकी आँखों से जारोजार आँसू बह रहे थे कि जिसे पराई समझकर हमेशा मन से दूर रखा, उसने तो हमेशा हमें गले ही लगाया, सुबह शाम अम्मा जी- अम्मा जी करती देखभाल करती रही।  हम ही मूरख थीं जो, सच्चे स्नेह को दिखावा मानकर खुद को ठगाती  रहीं। आज वह जान गई थी कि  बेटियाँ पराई ही होती हैं, अपनी तो बहुएँ होती हैं ,जो नए आँगन में, नई मिटटी में रोप दी जाती हैं, उसके बाद भी फलती फूलती हैं,  ढलती उम्र में हमारा सहारा बनती हैं।  मानो खुद को ही सीख देती हुए बोलीं -“हम सासुओं को बेटियों को विदा करते हुए सच्चे मन से विदा कर देना चाहिए और बहुओं को गृह प्रवेश करते हुए पूरे और सच्चे मन से अपना लेना चाहिए।मन ही मन उन्होने कुछ तय किया और शान्त मन से सो गईं।

सुबह उठीं, बहू को आवाज़ दी, उसके आने पर बोलीं .. ‘’सुन तो ममता,  रज्जू से कहना बिट्टी की वापसी की टिकट करा दे, जाए। अपना घर बार देखे बहुत दिन हो गए …कब तक मायके में पड़ी रहेगी, पराई गृहस्थी में  टाँग अड़ाती रहेगी।

-0-



उठो

सीधी खड़़ी हो

और खुद पर यकीन करो 

तुम किसी से कम नहीं हो 

तुम झूठे पौरुष के दंभ में डूबे  

जानवरों का शिकार तो

बिलकुल नहीं बनोगी

तुम जिंदगी में किसी से नहीं डरोगी ….

***  

अपने

पैरों के नीचे की जमीन 

और सर के ऊपर का आसमान 

तुम खुद तलाश करोगी 

तुम्हे अपनी जिंदगी से जो चाहिए

उसके होने या न होने की राह भी 

तुम खुद ही तय करोगी

तुम जिंदगी में किसी से नहीं डरोगी ….

***

रिश्तों का मोल 

तुम खूब पहचानती हो 

इनको निभाने का सलीका भी 

तुम खूब जानती हो लेकिन 

तुम कमजोर नहीं हो

अपने स्वाभिमान की कीमत पर 

तुम कुछ नहीं सहोगी  

तुम जिंदगी में किसी से नहीं डरोगी ….

प्यार …



मै भारत-भूमि !
ना जाने कब से
ढूंढ रही हूँ
अपने हिस्से की
रोशनी का टुकड़ा….
लेकिन पता नहीं क्यो
भृष्ट अव्यस्था के ये अँधेरे
इतने गहरे हैं
कि फ़िर फ़िर टकरा जाती हूँ
अंधी गुफा की दीवारों से…
बाहर निकल ही नहीं पाती
इन जंजीरों से,
जिसमे मुझे जकड़ कर रखा है
मेरी ही संतानों ने


उन संतानों ने
जिनके पूर्वजों ने
लगा दी थी
जान की बाज़ी
मेरी आत्मा को
विदेशियों की चंगुल से
मुक्त कराने के लिए

हँसते हँसते
खेल गए जान पर
शहीद हो गये
माँ की आन पर
एक वो थे
जिनके लिए
देश सब कुछ था
देश की आजादी
सबसे बड़ी थी
एक ये हैं
जिनके लिए
देश कुछ भी नहीं
देश का मान सम्मान
कुछ भी नहीं
बस कुछ है तो
अपना स्वार्थ,
अपनी सम्पन्नता और
अपनी सत्ता ……


.

हफ्तों की बारिश और जबरदस्त ठंड के बाद जब धूप निकले तो कुछ ऐसा खय़ाल आता है मन में 😊

बहुत दिनों के बाद
सूख पायी है
चुनरी धरती की

सूरज दादा
कहाँ रहे
तुम इतने दिन तक

आए हो तो
अब ठहरो
कुछ थोड़े दिन को

ज़रा चैन से
बैठो
बोलो और बतियाओ
ठंडी और बारिश
इन दोनो ने
बहुत सताया
अब तुम
इन को धता बताओ


रंगों का मौसम 

पतंगों का मौसम 

तिल-गुड़ की सौंधी मिठास का मौसम 

लो शुरू हुआ नया साल  ।१।

मौसम का मिज़ाज बदला

हवा का अन्दाज़ 

और बदली सूर्य की चाल 

लो शुरू हुआ नया साल ।२।

उड़ती पतंगें यूँ लगें 

मानो आसमाँ पे बिछ गयी 

रंगों की तिरपाल 

लो शुरू हुआ नया साल ।३।


क््या हमारी शिक्षा ने हमको सचमुच कुछ बेहतर इंसान बनाया है…. या कि हमने सिर्फ किताबी ज्ञान हासिल किया है बस इसलिए कि एक अच्छी नौकरी मिल सके।  जब कोई पढ़ लिख कर अपने घर गांव से निकल कर विदेशी धरती तक काम की तलाश में पहुँच जाता है और सफलता पूर्वक वहाँ अपनी जिंदगी के लिए समतल राहें बना लेता है तो ऐसा माना जाता है कि वह व्यक्ति साधारण आमजन से थोड़ा ऊपर उठ गया  है,  पढाई-लिखाई में भी और विचारधारा में भी। उस की विचारधारा जात-पात  छुआछूत, अंधविश्वासों इत्यादि से ऊपर उठ गई होगी।  लेकिन नहीं ऐसा बिलकुल नहीं होता …  हम कितने भी पढ़ लिख जाएँ, कहीं भी पहुँच जाएँ मगर हम अपनी रूढ़िवादी विचारधारा से बाहर नहीं निकलते। हम जहाँ भी जाते हैं, जात-पात  छुआछूत इन सबकी पोटली अपने साथ अपने दिल और दिमाग में बाँध कर ले जाते हैं। 
आप सोच रहे होंगे कि  ये मैं कैसे बेतुकी सी बात कर रही हूँ तो मैं आपको बतादूँ ऐसा बिलकुल भी नहीं है… यहाँ पर कैलिफ़ोर्निया की कोर्ट में सिस्को जैसी बड़ी और जानीमानी कंपनी में  जात-पात  के नाम पर  उच्च जाति  के भारतीयों द्वारा निम्न जाति के भारतीय के साथ  भेदभाव तथा उत्पीड़न का मामला दर्ज हुआ है।  यह ऐसा इकलौता मामला नहीं है , बहुत से ऐसे मामले भी हैं जो न्यायालय या अन्य न्यायिक संस्थाओं तक नहीं पहुंचे हैं।  
नीचे दिए लिंक पर क्लिक करके स्वयं पढ़ लीजिए विस्तार से 

https://www.cnn.com/2020/07/01/tech/cisco-lawsuit-caste-discrimination/index.html?fbclid=IwAR1O71XOXAY7XM_lP5rOA2nbvZk7ZPIcUxcZKW9WcfWZ_I2tjX2iVsxxHb8

बिटिया…


समय कैसे पंख लगा कर उड़ता है, पता ही नहीं चला कब वो २० इंच की नन्ही सी गुड़िया इतनी बड़ी हो गयी कि अगले साल कॉलेज चली जाएगी, और घर सूना सूना लगेगा …

इला के जन्मदिन पर बहुत दिनों के बाद कुछ हाइकु लिखे हैं ।

फूल की पाँख
सूरज की किरण
नन्ही बिटिया ।१।

नन्ही चिरैया
घर भर में डोले
मिश्री सी घोले ।२।

नन्ही बिटिया
देखते ही देखते
बड़ी हो गयी ।३।

मुट्ठी में बांधे
जीवन का सारांश
साँसों की डोर ।४।

उड़ जाएगी
उड़ान परखेगी
आँगन सूना ।५।

जाएगी दूर
परवाज़ तोलने
मन उदास ।६।


अवसान भी इतना खूबसूरत… आसन्न अंत के स्वागत में मानो उत्सव सजा है… यह पतझड़ का मौसम है या रंगों की बहार
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आज हिन्दी दिवस के अवसर पर सभी हिन्दी प्रेमियों को बहुत बहुत शुभकामनाएँ !

हमारे जैसे लोग जो जीवन के सफर में घूमते हुए परदेस में आकर बस तो गए हैं लेकिन अपनी भाषा और संस्कृ्ति से आज भी उतनी ही गहराई से जुड़़े हए हैं । हमारे उसी हिन्दी प्रेम की अभिव्यक्ति स्वरूप कुछ पंक्तियाँ प्रस्तुत हैं 

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हम हिन्द देश के वासी हैं

और हिंदी अपनी भाषा है

हिंदी जन जन तक पहुंचाएं

बस इतनी सी अभिलाषा है  

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अपनी भाषा और संस्कृति के

बल पर ही जाने जाएंगे 

हम  रहें कहीं भी दुनिया में

हिंदुस्तानी कहलायेंगे

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सम्मान करेंगे पूरा हम…. 

दुनिया की हर भाषा का 

पर मान न कम होने देंगे हम 

तनिक कहीं निज भाषा का 

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दुनिया की सारी धरती पर

हिंदी का परचम लहराएंगे 

हम  रहें कहीं भी दुनिया में

हिंदुस्तानी कहलायेंगे

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