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रंगों का मौसम 

पतंगों का मौसम 

तिल-गुड़ की सौंधी मिठास का मौसम 

लो शुरू हुआ नया साल  ।१।

मौसम का मिज़ाज बदला

हवा का अन्दाज़ 

और बदली सूर्य की चाल 

लो शुरू हुआ नया साल ।२।

उड़ती पतंगें यूँ लगें 

मानो आसमाँ पे बिछ गयी 

रंगों की तिरपाल 

लो शुरू हुआ नया साल ।३।


क््या हमारी शिक्षा ने हमको सचमुच कुछ बेहतर इंसान बनाया है…. या कि हमने सिर्फ किताबी ज्ञान हासिल किया है बस इसलिए कि एक अच्छी नौकरी मिल सके।  जब कोई पढ़ लिख कर अपने घर गांव से निकल कर विदेशी धरती तक काम की तलाश में पहुँच जाता है और सफलता पूर्वक वहाँ अपनी जिंदगी के लिए समतल राहें बना लेता है तो ऐसा माना जाता है कि वह व्यक्ति साधारण आमजन से थोड़ा ऊपर उठ गया  है,  पढाई-लिखाई में भी और विचारधारा में भी। उस की विचारधारा जात-पात  छुआछूत, अंधविश्वासों इत्यादि से ऊपर उठ गई होगी।  लेकिन नहीं ऐसा बिलकुल नहीं होता …  हम कितने भी पढ़ लिख जाएँ, कहीं भी पहुँच जाएँ मगर हम अपनी रूढ़िवादी विचारधारा से बाहर नहीं निकलते। हम जहाँ भी जाते हैं, जात-पात  छुआछूत इन सबकी पोटली अपने साथ अपने दिल और दिमाग में बाँध कर ले जाते हैं। 
आप सोच रहे होंगे कि  ये मैं कैसे बेतुकी सी बात कर रही हूँ तो मैं आपको बतादूँ ऐसा बिलकुल भी नहीं है… यहाँ पर कैलिफ़ोर्निया की कोर्ट में सिस्को जैसी बड़ी और जानीमानी कंपनी में  जात-पात  के नाम पर  उच्च जाति  के भारतीयों द्वारा निम्न जाति के भारतीय के साथ  भेदभाव तथा उत्पीड़न का मामला दर्ज हुआ है।  यह ऐसा इकलौता मामला नहीं है , बहुत से ऐसे मामले भी हैं जो न्यायालय या अन्य न्यायिक संस्थाओं तक नहीं पहुंचे हैं।  
नीचे दिए लिंक पर क्लिक करके स्वयं पढ़ लीजिए विस्तार से 

https://www.cnn.com/2020/07/01/tech/cisco-lawsuit-caste-discrimination/index.html?fbclid=IwAR1O71XOXAY7XM_lP5rOA2nbvZk7ZPIcUxcZKW9WcfWZ_I2tjX2iVsxxHb8

बिटिया…


समय कैसे पंख लगा कर उड़ता है, पता ही नहीं चला कब वो २० इंच की नन्ही सी गुड़िया इतनी बड़ी हो गयी कि अगले साल कॉलेज चली जाएगी, और घर सूना सूना लगेगा …

इला के जन्मदिन पर बहुत दिनों के बाद कुछ हाइकु लिखे हैं ।

फूल की पाँख
सूरज की किरण
नन्ही बिटिया ।१।

नन्ही चिरैया
घर भर में डोले
मिश्री सी घोले ।२।

नन्ही बिटिया
देखते ही देखते
बड़ी हो गयी ।३।

मुट्ठी में बांधे
जीवन का सारांश
साँसों की डोर ।४।

उड़ जाएगी
उड़ान परखेगी
आँगन सूना ।५।

जाएगी दूर
परवाज़ तोलने
मन उदास ।६।


अवसान भी इतना खूबसूरत… आसन्न अंत के स्वागत में मानो उत्सव सजा है… यह पतझड़ का मौसम है या रंगों की बहार
.


आज हिन्दी दिवस के अवसर पर सभी हिन्दी प्रेमियों को बहुत बहुत शुभकामनाएँ !

हमारे जैसे लोग जो जीवन के सफर में घूमते हुए परदेस में आकर बस तो गए हैं लेकिन अपनी भाषा और संस्कृ्ति से आज भी उतनी ही गहराई से जुड़़े हए हैं । हमारे उसी हिन्दी प्रेम की अभिव्यक्ति स्वरूप कुछ पंक्तियाँ प्रस्तुत हैं 

.

.

हम हिन्द देश के वासी हैं

और हिंदी अपनी भाषा है

हिंदी जन जन तक पहुंचाएं

बस इतनी सी अभिलाषा है  

**

अपनी भाषा और संस्कृति के

बल पर ही जाने जाएंगे 

हम  रहें कहीं भी दुनिया में

हिंदुस्तानी कहलायेंगे

**

सम्मान करेंगे पूरा हम…. 

दुनिया की हर भाषा का 

पर मान न कम होने देंगे हम 

तनिक कहीं निज भाषा का 

**

दुनिया की सारी धरती पर

हिंदी का परचम लहराएंगे 

हम  रहें कहीं भी दुनिया में

हिंदुस्तानी कहलायेंगे

-:-


…. 

उठो

सीधी खड़ी हो

और खुद पर यकीन करो 

तुम किसी से कम नहीं हो 

तुम झूठे पौरुष के दंभ का शिकार 

जानवरों का शिकार तो

बिलकुल नहीं बनोगी

तुम जिंदगी में 

किसी से नहीं डरोगी ….

*** 

 

अपने

पैरों के नीचे की जमीन 

और सर के ऊपर का आसमान 

तुम खुद तलाश करोगी 

तुम्हे अपनी जिंदगी से जो चाहिए

उसके होने न होने की राह भी 

तुम खुद तय करोगी

तुम जिंदगी में 

किसी से नहीं डरोगी ….

***

 

रिश्तों का मोल 

तुम खूब पहचानती हो 

इनको निभाने का सलीका भी 

खूब जानती हो लेकिन 

तुम कमजोर नहीं हो

अपने स्वाभिमान की कीमत पर 

तुम कुछ नहीं सहोगी  

तुम जिंदगी में  

किसी से नहीं डरोगी ….

***

 


ओ दुःख के काले अंधियारों
वक़्त की चाल भले धीमी हो
पर तुमको तो छँटना होगा …
आज नहीं तो कल होगा

सूरज की इक रेख सरीखी
ख़ुशियाँ इक दिन चमकेंगी
सपना इक दिन सच होगा
आज नहीं तो कल होगा

#CoronavirusPandemic

 

 


कान्हा से एक संवाद उनके जन्मदिन पर

——————————————

कहाँ हो कान्हा
अब आ भी जाओ ना..
काटे नहीं कटते
तुम्हारे बिना
दुःख इस धरा के
ले ही लो अवतार …

फ़िर छिड़ा है युद्ध
पर इस बार दुश्मन अदृश्य है
दांव पर है ज़िंदगी इंसान की …
कुछ करो छेड़ो कोई फिर राग
अपनी बांसुरी की धुन सुनाओ
मिटें सारे क्लेश कुछ जादू चलाओ ।

या कि तुम हो रुष्ट  
मूँद ली हैं आँख तुमने
और फिर कर के किनारा
ठान ली है… सबक़ दोगे 

बस करो …
जो हुआ काफ़ी हुआ
अब माफ़ कर दो
जन्मदिन पर दे ही दो उपहार सबको
सृष्टि का सुंदर सरस सामंजस्य फिर से हो प्रवाहित
कुछ करो ऐसा यही है प्रार्थना
जन्मदिन की ढेर सी शुभकामना
कान्हा तुम्हें जन्मदिन की ढेर सी शुभकामना

जन्माष्टमी की बहुत बहुत शुभकामनाएँ !

.

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संगम


एक का एक में विलीन हो कर

            एक नए अस्तित्व में गढ़ जाना

                                 बस यही तो है संगम….

                                       तुम और मैं का हम हो जाना ।


अशोक चक्रधर जी की रचनाएँ पढ़ना और सुनना एक बहुत सुंदर अनुभव है। मैंने डॉक्टर रेशमा के ब्लॉग पर पढ़ा तो आप सब दोस्तों से शेयर किए बिना नहीं रह सकी …

wholistic wellness space

जंगल गाथा

एक नन्हा मेमना
और उसकी माँ बकरी,
जा रहे थे जंगल में
राह थी संकरी।
अचानक सामने से आ गया एक शेर,
लेकिन अब तो
हो चुकी थी बहुत देर।
भागने का नहीं था कोई भी रास्ता,
बकरी और मेमने की हालत खस्ता।
उधर शेर के कदम धरती नापें,
इधर ये दोनों थर-थर कापें।
अब तो शेर आ गया एकदम सामने,
बकरी लगी जैसे-जैसे
बच्चे को थामने।
छिटककर बोला बकरी का बच्चा-
शेर अंकल!
क्या तुम हमें खा जाओगे
एकदम कच्चा?
शेर मुस्कुराया,
उसने अपना भारी पंजा
मेमने के सिर पर फिराया।
बोला-
हे बकरी – कुल गौरव,
आयुष्मान भव!
दीर्घायु भव!
चिरायु भव!
कर कलरव!
हो उत्सव!
साबुत रहें तेरे सब अवयव।
आशीष देता ये पशु-पुंगव-शेर,
कि अब नहीं होगा कोई अंधेरा
उछलो, कूदो, नाचो
और जियो हँसते-हँसते
अच्छा बकरी मैया नमस्ते!
इतना कहकर शेर कर गया प्रस्थान,
बकरी हैरान-
बेटा ताज्जुब है,
भला ये शेर किसी…

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