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*

तुम हों या हम सब कुछ मनमुताबिक तो नहीं होगा 

इसलिए थोड़ी जहमत हम उठायें, थोड़ी तुम उठाओ 

*
रिश्तों के बीच उलझने हों तो उन्हें सुलझाओ

 उन पर जल्दबाजी में बस कैंची तो मत चलाओ 

*

जहाँ चार बर्तन होंगे तो खट – पट तो होगी ही 

निजात पाने को बर्तनों से पीछा तो मत छुड़ाओ 

*

बैठो, देखो भालो,  कुछ समझो और कुछ समझाओ 

सच्चे रिश्ते बड़ी नेमत है, रूठे हों तो प्यार से मनाओ 

*

खोने में वक्त नहीं लगता,  पाने में उम्र गुज़र जाती है 

इतनी सी बात खुद भी समझो और औरों को भी समझाओ

*

थोड़ी जहमत हम उठायें, थोड़ी तुम उठाओ  !!

 

ख्वाहिशें …


१.

ख्वाहिशें 

परिंदो सी हैं 

छोटी छोटी 

खुशियों की खोज में 

यहाँ वहां उड़ती फिरती हैं  

२.

कितनी ख्वाहिशों ने

दम तोड़े होंगे

तब कहीं जा कर

यह तजुर्बे की चाँदी चढ़ी है

बाल धूप में नहीं पकते 

३.

अल्लाह !  

ये ख्वाहिशों की उड़ान

कहीं, दम ही न ले ले

ख़ुदा ही जाने,

ये निगोड़े पाँव 

कहाँ तक साथ देंगे

४. 

मेरी ख्वाहिशों ने

रिश्ते जोड़ लिए आसमानों से

उगा लिए हैं पंख

और उड़ने लगी हैं हवाओं में

हमने ख़त जब लिखा ….


हमने ख़त जब लिखा तो सब कुछ लिखा 

बस नहीं लिख सके  तो.. अपनी  व्यथा ….

-:-

माँ की आँखों की मद्धम हुयी रौशनी और 

बाबा की खांसी का विवरण लिखा 

खेत साहू  ने गिरवी तो रखे मगर 

बेच डाले बही में हैं ये भी लिखा 

-:-

हमने ख़त जब लिखा तो सब कुछ लिखा 

बस नहीं लिख सके  तो.. अपनी  व्यथा ….

-:-

कुछ घर की लिखी कुछ जग का लिखा 

कुछ इसकी लिखी कुछ उसका लिखा 

क्या पढ़ा तुमने बस   जो … लिखा गया 

या कि वो भी पढ़ा जो रहा अनलिखा

 -:-

हमने ख़त जब लिखा तो सब कुछ लिखा 

बस नहीं लिख सके  तो.. अपनी  व्यथा….

-:-


 

 

 

जिंदगी यदि ठहर जाए,  तो अनूदित मृत्यु है 

और जीने के लिए अविरल भटकना चाहता हूँ

जिंदगी को जिंदगी सा जी सकूँ इसके लिए 

हे प्रिये ! मैं तुम्हारा साथ हर पल चाहता हूँ   

 

….

 

ना जाने क्यूँ ….


नहीं हो पाते
अक्सर…गीत पूरे
चंद शब्दों की तलाश
अंतहीन हो जाती है…
ना जाने क्यूँ ?
….

पलकों के
बंद होने का
इंतजार करते हुये
आँखों की कोर पर
अटके हुये सपने,
बस अटके ही
रह जाते हैं ,
आँखों में नहीं आ पाते …
ना जाने क्यूँ ?
….

दूर दूर तक फैले
विस्तृत आकाश में
आता है बस
एक नन्हा सा टुकड़ा
मेरे हिस्से
मेरे पंख भी पूरे
खुल नहीं पाते …
उड़ने की चाहत
बस ख्वाहिश ही रह जाती है
ना जाने क्यूँ ?

मेरे सपने भी
 कुछ अजीब से हैं शायद
उन के लिए सब
या तो
छोटा पड़ जाता है
या फ़िर
अधूरा रह जाता है
ना जाने क्यूँ ?
….

बहुत
कोशिश की है
ढूंढ लूँ
हर उस सवाल का जवाब
जो अंदर ही अंदर
अलाव सा धधकता रहता है
लेकिन कब कहाँ कैसे
शुरुआत करूँ
बस ये ही
समझ नहीं आता
और तलाश अधूरी ही रह जाती है 

ना जाने क्यूँ…


*

जो टूट गया

वो शायद टूटना ही था

जो छूट गया

उसे शायद छूटना ही था 

कदम से कदम

साथ मिलाकर

चलने का साथ

शायद इतना ही था ..

वैसे

अगर मै ठीक से सोचूं ..

तो गया क्या  ..

बस एक देह ही तो

*

वरना.. तुम 

और तुम्हारे अहसास  

सब यहीं तो है आस पास

*

कौन छीन सकता है

वो सब

जो मन के अन्दर है  

सांसों में तार तार

ताने बाने सा बुना है

*

नेह का

वो अथाह सागर 

जिसको बूँद बूँद  

इतने सालों तक

 साथ साथ भरा  

*

मृत्यु  में

है  साहस 

तो  छीन कर दिखाए  !

और तो सब ठीक है

बस

तुम जब  याद आए

बहुत याद आए !

*

दिल का अफसाना ….


*

उदासी के मौसम में

खिलते हैं

ख़ामोशी के फूल

सांसों के दरख़्त पर

*

तब हलचल सी होती है

यादों की जमीन पर

और जनम लेता है

एक अहसास….

*

फिर दिल

ढूँढने निकलता है

बेख़याली में

वो लम्हे

जो फिसल गये थे

कभी हाथों से

रेत की तरह

*

और  तब

बेचारे  ख़याल

यहाँ वहाँ

अपनी ज़मीन तलाशते

थक हार कर…

कलम में

स्याही बनकर

उतर अाते हैं

साफ सफ़ेद सफहों पर

दिल का अफसाना

बयाँ करने …..

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