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सपने 

ख़ुद नहीं बनते

उन्हें  बीजना पड़ता है 

फिर सींचना पड़ता है 

उम्मीद की बारिश में

 कभी – कभी तो 

पूरा जीवन बीत जाता है 

उन्हें पोसते पोसते 

लेकिन अंकुर नहीं फूटते

शायद जिन्दगी जीने का  

हुनर ही भूल गए …

 


.

ग़लत या सही

शायद ऐसा

कुछ होता ही  नहीं

होता है तो बस

परिस्थितियों को

अपने अपने ढंग से

देखने का नज़रिया 

लेकिन फिर भी

जब अन्दर ही अन्दर

कुछ टूटने सा लगता है

और, आस-पास

कोई नहीं होता

उस पीड़ा को

बाँटने के लिए

तो लगता है

हम नाहक ही जिए

कौन है अपना

क्या व्यर्थ ही भागते रहे

रिश्तों के लिए

.
 

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एक बात कहें 

हमने ये जो ज़रा सा 

खुला आसमान देखा है न  

इसके लिए हमने 

बहुत जद्दोज़हद की है

वर्ना  तुमने तो 

पर उगने से पहले ही 

हमें जिबह करने में 

कोई कसर कहाँ छोड़ी थी

खैर

कोई बात नहीं 

बरसों से जमे ग्लेशियर 

अब पिघल गए हैं 

हमारे ऊपर की सब बर्फ 

बह गई है

धूप भी निकल आई है

हमारे परों में भी 

नई जान आई ही समझो 

ज़रा ठहरो 

फिर देखना हमारी परवाज़ 

हमारी मंज़िल आसमान है 

.

.


.

उड़ने की स्वतंत्रता 

और परों को उड़ान 

एक बार दे कर तो देखो

फिर देखना हमारा हौसला 

पूरा का पूरा आसमान 

ला कर ही न थमा दें 

तुम्हारे हाथों में तो कहना…

.


आज रात चाँद
ज़रा देर से
खिड़की पर आया
था भी कुछ अनमना सा
पूछा …. तो कुछ बोला नहीं
शायद उसने सुना नहीं
या फिर अनसुनी की
राम जाने….
लेकिन ये तो तय है
था उदास, चेहरा भी
कुछ पीला पीला सा ही लगा
यूँ ही थोड़ी देर
इधर उधर पहलू बदलते
बादलों की ओट में
छुपते छुपाते
न जाने कब
चुपके से नीचे उतर
झील में जा बैठा शायद रो रहा था


.

.

१. 

देखो गुलाल 

उड़ा गया सूरज 

शर्माई शाम 

२. 

लाली का टीका 

साँझ के माथे पर 

धरा सूर्य ने 

३. 

भेजी नभ ने 

सितारों की चुनरी 

शाम सजेगी 

४. 

आई है शाम 

बदली धरती ने 

नारंगी साड़ी 

५. 

लाल गगन 

शाम के सिंदूर में 

रंग रंगीला 

.

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