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कल मैंने यह पोस्ट Facebook पर शेयर की थी  एक कमेंट के साथ

“Watch it, Share it, make it happen …. These monsters MUST get arrested and punished ASAP, help to find them.  Shame on all those who have been sharing the video on WhatsApp

और आज ……

मैं लोगों की असंवेदनशीलता से हैरान हूँ, उस फेसबुक पर जहाँ लोग एक प्रोफाइल पिक्चर के बदले जाने पर 100-50 लाइक्स और कमेंट्स बस यूँ ही कर देते हैं। किसी राजनीतिक उठा-पटक की खबर पर अपनी अपनी राय जताने के लिए टूट पड़ते हैं। उसी फेसबुक पर इतने गंभीर विषय पर शेयर की गयी एक पोस्ट को लोगों को देखने तक की फुर्सत नहीं है। क्या यह इस बात का प्रमाण नहीं है कि हम इंसानियत से बहुत दूर चले गए हैं और जाने या अनजाने हम भी लगातार बढ़ते हुए ऐसे हादसों के लिए किसी हद तक जिम्मेदार हैं। क्षमा चाहती हूँ अगर मेरे ऐसा लिखने से किसी के मान सम्मान को ठेस पहुँचती हो लेकिन हाथ कंगन को आरसी क्या ……. कल से आज तक सिर्फ एक व्यक्ति ने पढ़ा है इस पोस्ट को।

क्या ऐसा नहीं होना चाहिए था, या नहीं हो सकता था कि मित्र, मित्र के मित्र, और मित्र के मित्र के मित्र …… जैसी एक चेन बना के २४ घंटों के अंदर इन दुर्दांत व्यभिचारियों तक पहुंचा जाता और इनको इनके किये का दंड देकर भविष्य में ऐसा करने की सोचने वालों की सोच पर लगाम लगायी जाती कि ऐसा घिनौना अपराध करके कोई छुप नहीं सकता उसको पाताल से भी खींच कर निकाल लिया जायेगा। ऐसा तो नहीं हो सकता न कि कोई इनको जानता ही नहीं हो या कि ये इस पृथ्वी गृह पर मौजूद ही नहीं हैं। ऐसा लग रहा है कि सोशल मीडिआ अपने ताकत के अनुरूप काम नहीं कर रहा है या फिर लोग इस बात से डर रहे हैं कि कहीं यह आग उन तक भी न पहुँच जाये क्योंकि वो लोग हमारे-आपके बीच के ही लोग होंगे जिन्होंने इस वीडिओ को WhatsApp पर शेयर किया होगा

यदि हम जानते हुए भी ऐसे किसी भी कृत्य को रोकने का प्रयास नहीं करते तो प्रत्यक्ष रूप से न सही लेकिन परोक्ष रूप से हम भी किसी हद तक दोषी हैं इस सामाजिक विकृति के लिए।

पानी सर के ऊपर निकल गया है, जागो, अपनी आत्मा को झंझोड़ कर जगाओ ……. अगर अब भी नहीं जागे तो इसका मतलब होगा कि हम आत्मिक रूप से मर चुके हैं, हमारे शरीर बेशक चल फिर रहे हों लेकिन हम जिन्दा नहीं मुर्दा हैं ……

.

All the laws may have changed. There may now be record numbers of women speaking out and seeking legal action against those who have molested or raped them but there are still people out there who brutalise women and children and…
M.NDTV.COM
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क्या फर्क पड़ता है !!


आज कल

हर रोज हर ओर 

बस नयी नयी 

ख़बरों का जोर है /

.

हर खबर 

जो आज नयी है 

कल 

पुरानी हो जाएगी 

बस फिर क्या 

एक नयी खबर की 

तलाश या 

तफ्तीश शुरू हो जाएगी /

.

यह खबरों और 

तफ्तीशों का खेल 

निर्बाध रूप से 

यूँ ही चलता रहेगा 

जैसे क्रिकेट का मैच 

कभी तुम्हारी बॉलिंग 

तो कभी हमारी /

.

लेकिन भैया 

सोचो तो ज़रा 

इस गेम में बॉल… कौन है

पब्लिक ही न 

पीटते रहो 

दे दनादन दे दनादन दे दनादन 

क्या फर्क पड़ता है !!

..

संघर्ष की राह पर ….


.

तुम 
जिनके लिए 
युद्ध में उतरे हो 
जिनके लिए 
तुमने 
संघर्ष की राह पर 
कदम रखे हैं 
उनके कानों तक 
तुम्हारी आवाज 
पहुंचेगी भी या नहीं
किसे पता…

..
ग़ुम न हो जाये 
सच्चाई कहीं
झूठ की चमक दमक में 
क्योंकि लोग 
आजकल 
शोर शराबे और 
दिखावे पे ज्यादा 
यकीन करते हैं 
ये अलग बात है 
जब ठोकर लगती है 
आँख खुलती है
तब तक सपने 
टूट चुके होते हैं !!!!

.

.

ये लकीरें ही तो हैं ….


१. 


बनती हैं बिगड़ती हैं 

नित नए रूप धरती हैं 

बिलकुल 

जिंदगी की तरह 

कभी खुलती हैं  

कभी सिमटती हैं  

कभी कभी 

चुहल भी करती हैं 

कभी ख़ुशी का तो 

कभी दुःख का  ग्रास 

जिंदगी के मुंह में 

धरते धरते 

हाथ पीछे खींच लेती हैं 

ये लकीरें ही तो हैं ….

जो जीवन को 

जीवन से जोड़ती हैं  

हमारी दिशा को मोड़ती हैं 

ये लकीरें ही तो हैं ….

 

२. 


हाथों की 

लकीरों के चलते  

भले ही 

खोया बहुत कुछ हो 

लेकिन तुम्हे पाया भी तो 

उन्ही लकीरों की बदौलत है 

.

तो 

लेनी-देनी 

नफा-नुकसान 

सब मिलाकर 

जिंदगी से 

कोई शिकायत नहीं

जिंदगी बहुत खूबसूरत है 

जियो अौर जीने दो :-)

 

 

दाँव पर दिल्ली ….


चुनाव 
——

चौपड़ सज गयी है

अब दुर्योधन हों या युधिष्टर

खेल ही तो खेलेंगे

कोई हारे….

कोई जीते ….

क्या फर्क पड़ता है

दाँव पर तो

द्रौपदी…..

नहीं नहीं दिल्ली ही है  !!

….

कौन है सबसे सही ?


चुनावी मौसम मे सबसे बड़ा सवाल  हम सब के सामने यही होता है कि “कौन है सबसे सही ? किसे चुनना चाहिये ? ” बस उसी ख़याल से उपजी यह पंक्तियाँ
——————

हर ओर से हमला ही हमला है हमारी सोच पे
अब तो तय करना है हमको किसको अपना वोट दें 
….

सज गए बाजार देखो हर गली मोड़ पर
हर कोई खुद को बताता दूसरों से बेहतर
….

हर किसी के पास वादों का जखीरा खूब है
और बातों के निशाने की अदा भी खूब है
….

जानते हैं ये सभी, बारीकियां व्यापार की
लोक-सेवा से है जादा चिंता अपने स्वार्थ की
….

ऐसे में किसकी सुनें, किसको चुनें मुश्किल बड़ी
सच कहें तो आ पड़ी, है बड़ी मुश्किल घड़ी
….

बढ़ गयी है और भी अब जिम्मेदारी हमपे ही
छांटना है, बीनना है, कौन है सबसे सही ?

….

मुट्ठियों में धूप …


.

अक्सर

सोचती हूँ कि

कब मौका मिले 

अौर

परख डालूँ  

मुट्ठियों में बंधी 

धूप का वजूद 

लेकिन 

पता नहीं क्यूँ

ये मुट्ठी है कि 

कभी वक्त पर 

खुलती ही नहीं !

-:-

 

 

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