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वह …


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वह 

पूरे परिवार की 

जिंदगी का ताना बाना होती है 

घर भर के दुःख दर्द आँसू 

हँसी मुस्कान और रिश्ते… सब 

उसके आँचल की गांठ से बंधे 

उसकी डिग्री या बिना डिग्री वाली 

मगर गजब की स्किल्स के आस पास  

जीवन की आंच में धीरे धीरे पकते रहते हैं 

बच्चों के कच्ची माटी से भविष्य 

उसके सधे हाथों में गढ़ते रहते हैं 

और वह चौबीस घंटे धुरी सी 

घूमती रहती है

सबकी साँसों में साँसे पिरोती रहती है 

पता ही नहीं चलता 

वो कब जान लेती है 

सबके मन की बात 

पर शायद ही 

कोई जान पाता है 

कभी उसके मन की बात 

ये भी कोई कहाँ जान पाता है कि

कब होती है उसकी सुबह 

और कब होती है रात 

उसका सोना जागना 

सब कुछ मानो 

एक जादू की छड़ी सा 

न जाने 

कौन से पल में निपट जाता है

उसके पास 

सबकी फरमाइशों का खाता है

सबके दुःख दर्द का इलाज  

और घर भर के सपनों को 

पालने का जुझारूपन भी

मौका पड़े तो लड़ जाए 

यमराज से भी 

पता नहीं ये अदम्य साहस 

उसमे कहाँ से आता है 

जो भी हो उसका 

आसपास होना बहुत भाता है

जीवन से उसका अटूट नाता है 

(उसे माँ के नाम से जाना जाता है )

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जब भी जहाँ 
ज़िंदगी में कड़ी धूप मिले
सघन वटवृक्ष सी छाया बन
सिर पर तने रहते हैं पिता 
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वक़्त की 
आँधियों के सामने 
ढाल बन कर 
अडिग खड़े रहते हैं पिता 
बारिश हो तूफ़ान हो 
ओलों की सारी मार 
अपने सिर पर सहते हैं पिता 
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सिर पर हाथ 
भले ही ना धरते हों  
पर सिर पर छत बनी रहे 
इसके लिए जीवन भर 
संघर्ष रत रहते हैं पिता 
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माएँ
बच्चा कोख में पालती हैं 
मगर अस्तित्व शुरू होने के
पहले से ही
बच्चे के भविष्य की 
कल्पना संजोते हुए 
बच्चा दिमाग में
पालने लगते हैं पिता
.

हवाएँ हैं…. 

हवाओं की..  कोई सरहद नहीं होती
ये तो सबकी हैं बेलौस बहा करती हैं
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हवाएँ हैं, ये कब किसी से डरती हैं
जहाँ भी चाहें बेख़ौफ़ चला करती हैं
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चाहो तो कोशिश कर के देख लो मगर
बड़ी ज़िद्दी हैं कहाँ किसी की सुनती हैं
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हवाएँ न हों तो क़ायनात चल नहीं सकती
इन्ही की इनायत है कि जिंदगी धड़कती है
**

 

बेलौस – निस्वार्थ, बिना किसी भेदभाव के


 

 

..

देश मेरी तुम्हारी या किसी की जागीर नहीं है

देश कागज पर कोई खींचीं हुई लकीर नहीं है 

देश न ही कुछ मुट्ठी भर लोगों की विरासत है

देश न ही केवल और केवल बस सियासत है

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देश वो मिटटी है जो गढ़ती है हमें रचती है 

देश वो खुश्बू है जो रग – रग में बसती है  

देश वो नाम है जो दुनिया में नाम देता है 

देश ही तो है जो एक पहचान हमें देता है 

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देश की माटी को अब यूँ न लजाओ 

देश के नाम पर अपनों का ही खूं न बहाओ  

देश के नाम पर अपने मतलब न सधाओ

देश को देश ही रहने दो खिलौना न बनाओ

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माएँ

कभी बेटियाँ थी

और बेटियाँ भी

कभी माएँ होंगी..

इसी रिश्ते की

रेशमी डोर में लिपटी

एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को

हस्तांतरित होती

प्रेम की परम्पराएँ….

धरोहर हैं ज़िंदगी  की !!

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नारी को

नारी ही रहने दो

देवी मत बनाना

पत्थर की हो जाएगी

 

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वक्त का

तकाज़ा है या

नए जमाने का चलन

हर चीज का

हर बात का

एक खास दिन मुक़र्रर है

ठीक है तो चलो

आज औरत को भी

सेलिब्रेट करें

उस औरत को

जो जिंदगी की नस नस में

दौड़ती हैं साँसे बनकर

वो औरत

जो धूप के टुकड़े सी है

जिसके बिना जिंदगी

जैसे बारिश की मारी

सीलन वाली बदरंग दीवार

 

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