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आज हिन्दी दिवस के अवसर पर सभी हिन्दी प्रेमियों को बहुत बहुत शुभकामनाएँ !

हमारे जैसे लोग जो जीवन के सफर में घूमते हुए परदेस में आकर बस तो गए हैं लेकिन अपनी भाषा और संस्कृ्ति से आज भी उतनी ही गहराई से जुड़़े हए हैं । हमारे उसी हिन्दी प्रेम की अभिव्यक्ति स्वरूप कुछ पंक्तियाँ प्रस्तुत हैं 

.

.

हम हिन्द देश के वासी हैं

और हिंदी अपनी भाषा है

हिंदी जन जन तक पहुंचाएं

बस इतनी सी अभिलाषा है  

**

अपनी भाषा और संस्कृति के

बल पर ही जाने जाएंगे 

हम  रहें कहीं भी दुनिया में

हिंदुस्तानी कहलायेंगे

**

सम्मान करेंगे पूरा हम…. 

दुनिया की हर भाषा का 

पर मान न कम होने देंगे हम 

तनिक कहीं निज भाषा का 

**

दुनिया की सारी धरती पर

हिंदी का परचम लहराएंगे 

हम  रहें कहीं भी दुनिया में

हिंदुस्तानी कहलायेंगे

-:-


…. 

उठो

सीधी खड़ी हो

और खुद पर यकीन करो 

तुम किसी से कम नहीं हो 

तुम झूठे पौरुष के दंभ का शिकार 

जानवरों का शिकार तो

बिलकुल नहीं बनोगी

तुम जिंदगी में 

किसी से नहीं डरोगी ….

*** 

 

अपने

पैरों के नीचे की जमीन 

और सर के ऊपर का आसमान 

तुम खुद तलाश करोगी 

तुम्हे अपनी जिंदगी से जो चाहिए

उसके होने न होने की राह भी 

तुम खुद तय करोगी

तुम जिंदगी में 

किसी से नहीं डरोगी ….

***

 

रिश्तों का मोल 

तुम खूब पहचानती हो 

इनको निभाने का सलीका भी 

खूब जानती हो लेकिन 

तुम कमजोर नहीं हो

अपने स्वाभिमान की कीमत पर 

तुम कुछ नहीं सहोगी  

तुम जिंदगी में  

किसी से नहीं डरोगी ….

***

 


ओ दुःख के काले अंधियारों
वक़्त की चाल भले धीमी हो
पर तुमको तो छँटना होगा …
आज नहीं तो कल होगा

सूरज की इक रेख सरीखी
ख़ुशियाँ इक दिन चमकेंगी
सपना इक दिन सच होगा
आज नहीं तो कल होगा

#CoronavirusPandemic

 

 


कान्हा से एक संवाद उनके जन्मदिन पर

——————————————

कहाँ हो कान्हा
अब आ भी जाओ ना..
काटे नहीं कटते
तुम्हारे बिना
दुःख इस धरा के
ले ही लो अवतार …

फ़िर छिड़ा है युद्ध
पर इस बार दुश्मन अदृश्य है
दांव पर है ज़िंदगी इंसान की …
कुछ करो छेड़ो कोई फिर राग
अपनी बांसुरी की धुन सुनाओ
मिटें सारे क्लेश कुछ जादू चलाओ ।

या कि तुम हो रुष्ट  
मूँद ली हैं आँख तुमने
और फिर कर के किनारा
ठान ली है… सबक़ दोगे 

बस करो …
जो हुआ काफ़ी हुआ
अब माफ़ कर दो
जन्मदिन पर दे ही दो उपहार सबको
सृष्टि का सुंदर सरस सामंजस्य फिर से हो प्रवाहित
कुछ करो ऐसा यही है प्रार्थना
जन्मदिन की ढेर सी शुभकामना
कान्हा तुम्हें जन्मदिन की ढेर सी शुभकामना

जन्माष्टमी की बहुत बहुत शुभकामनाएँ !

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संगम


एक का एक में विलीन हो कर

            एक नए अस्तित्व में गढ़ जाना

                                 बस यही तो है संगम….

                                       तुम और मैं का हम हो जाना ।


अशोक चक्रधर जी की रचनाएँ पढ़ना और सुनना एक बहुत सुंदर अनुभव है। मैंने डॉक्टर रेशमा के ब्लॉग पर पढ़ा तो आप सब दोस्तों से शेयर किए बिना नहीं रह सकी …

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जंगल गाथा

एक नन्हा मेमना
और उसकी माँ बकरी,
जा रहे थे जंगल में
राह थी संकरी।
अचानक सामने से आ गया एक शेर,
लेकिन अब तो
हो चुकी थी बहुत देर।
भागने का नहीं था कोई भी रास्ता,
बकरी और मेमने की हालत खस्ता।
उधर शेर के कदम धरती नापें,
इधर ये दोनों थर-थर कापें।
अब तो शेर आ गया एकदम सामने,
बकरी लगी जैसे-जैसे
बच्चे को थामने।
छिटककर बोला बकरी का बच्चा-
शेर अंकल!
क्या तुम हमें खा जाओगे
एकदम कच्चा?
शेर मुस्कुराया,
उसने अपना भारी पंजा
मेमने के सिर पर फिराया।
बोला-
हे बकरी – कुल गौरव,
आयुष्मान भव!
दीर्घायु भव!
चिरायु भव!
कर कलरव!
हो उत्सव!
साबुत रहें तेरे सब अवयव।
आशीष देता ये पशु-पुंगव-शेर,
कि अब नहीं होगा कोई अंधेरा
उछलो, कूदो, नाचो
और जियो हँसते-हँसते
अच्छा बकरी मैया नमस्ते!
इतना कहकर शेर कर गया प्रस्थान,
बकरी हैरान-
बेटा ताज्जुब है,
भला ये शेर किसी…

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डॅा. रेशमा हिंगोरानी की एक बहुत ही आवश्यक और ज्ञानवर्धक पोस्ट…

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कुछ मूल जानकारी:

  1. तलफ़्फ़ुज़: शब्दार्थ – उच्चारण, मुंह से शब्द निकालना।
  2. नुक़्ता:
    • अरबी लफ़्ज़, देवनागरी, गुरमुखी और अन्य लिपियों में किसी व्यंजन अक्षर के नीचे लगाए जाने वाला बिंदु
    • जैसे ‘ज’ के नीचे नुक़्ता लगाने से ‘ज़’ बन जाता है और ‘ड’ के नीचे नुक़्ता लगाने से ‘ड़’ बन जाता है।
  3. नुक़्ते का प्रयोग:
    • उर्दू, अरबी, फ़ारसी ज़ुबानों से हिंदी भाषा में आएवर्णों को अलग से बताने के लिए इस्तेमाल किया जाता है जैसे: क, ख, ग, ज, फ।
    • नुक़्ते के बिना इन भाषाओं से लिए गए शब्दों को हिंदी में सही से उच्चारित नहीं किया जा सकता।
  4. क, ख, ग में नुक़्ते का प्रयोग हिंदी भाषा में अनिवार्य नहीं है परन्तु ‘ज़’ और ‘फ़’ में नुक़्ता लगाना आवश्यक है।
  5. कोई भी ज़ुबान सही से बोली जाए, तभी उसकी ख़ूबसूरती निखर कर आती है।
  6. मगर उर्दू ज़ुबान में सही तलफ़्फुज़ की एहमियत का अंदाज़ा आप इन शब्द…

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वीरान सड़कें 

टी वी से चिपक कर 

बैठे हुए लोग 

बढ़ती महामारी के 

बदलते आंकड़ों पर 

गिद्ध सी नज़र।  

कल तक जो आदमी 

दुनिया को मुट्ठी में समेट 

हवाओं में उड़ता था  

कितना बेचारा है आज 

चाँद की तो कौन कहे 

धरती पर भी  

घर की दहलीज़ के बाहर 

पाँव रखने से डरता है 

लेकिन 

शायद अभी भी 

दिमाग़ ठिकाने पर नहीं है   

इतनी तबाही देख ली मगर 

जाति धर्म और राजनीति के 

पचड़ों में अभी भी उलझा हुआ है 

न जाने 

कब सीखेगा  

इंसानियत की भाषा 

2017


हिन्दी हाइकु(HINDI HAIKU)-'हाइकु कविताओं की वेब पत्रिका'-2010 से प्रकाशित हो रही है। आपकी हाइकु कविताओं का स्वागत है !

1-मंजु मिश्रा

1.

सर्दी ने छीने 

जो पेड़ों के गहने 

लाया वसंत 

 2.

तितलियों ने 

वासंती खत लिखे 

मौसम के नाम

 3.

सर्दी की भोर

चमकतीं हीरे सी  

ओस की बूँदें 

 4.

रात रोई थी 

चमक रहे दूब पे 

ओस- से आँसू  

 5.

लाया वसंत 

खुशियों की हट 

बिखरे रंग 

6.

उड़ते ख्वाब 

हवा की डोरी  संग 

जैसे पतंग 

 7.

ढल रहा है 

सागर की गोद मे 

थकासा सूर्य

 8.

पुल के पार 

डूब रही है साँझ 

लाल सिंदूरी

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कोरोना के भय ने सारे समीकरण उल्टे-पुल्टे कर दिए हैं । अब देखिए न कहाँ तो लोगों को हिल-मिल कर साथ-साथ रहने को कहा जाता था और आज सबको सोशल डिस्टेंसिंग रखने को कहा जा रहा है,  एक दूसरे से दूर-दूर रहने की हिदायत दी जा रही है । इसी जमीन पर यह एक शेर बना है…

जऱा सा फ़सला रखिए जनाब हर किसी से 

बहुत नजदीक अाएँगे तो साँसे रूठ जाएँगी

Stay Home, Be Safe, Protest Yourself and Protect Community