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Archive for the ‘अनुभूतियाँ’ Category


 

*

मन के 

आँगन की 

दीवारों पर… 

न जाने कहाँ कहाँ 

कौन कौन सी दरार ढूंढ कर 

उग आती हैं यादें 

और धीरे धीरे 

पीपल सी जड़ें जमा लेती हैं 

फिर एक दिन 

ढह जाती है आँगन की दीवार 

और यादें दफ़न हो जाती हैं 

अपने ही बोझ तले 

*

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.

बरस महीने दिन 

छोटे छोटे होते 

अदृश्य ही हो जाते हैं 

और मैं 

बैठी रहती हूँ 

अभी भी 

उनको उँगलियों पे 

गिनते हुए 

बार बार 

हिसाब लगाती हूँ 

मगर

जिन्दगी का गणित है कि

सही बैठता ही नहीं

.

.

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-:-

देखो…

तुम रोना मत 

मेरे घर की  दीवारें

कच्ची हैं 

तुम्हारे आंसुओं का बोझ 

ये सह नहीं पाएंगी 

-:-

वो तो

महलों की दीवारें होती हैं 

जो न जाने कैसे

अपने अंदर 

इतनी सिसकियाँ

समेटे रहती हैं और 

फिर भी

सर ऊंचा करके

खड़ी रहती हैं 

-:-

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-:-

रिश्ते

मरते नहीं 

क़त्ल किये जाते हैं 

कभी कुछ हादसे हो जाते हैं 

जो घातक बन जाते हैं 

तो कभी कुछ 

सोच समझ कर 

ठन्डे दिमाग से

योजनाबद्ध तरीके से 

क़त्ल किये जाते हैं 

मगर

ये सच है कि 

रिश्ते मरते नहीं 

क़त्ल किये जाते हैं  !!

-:-

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*

जानती हूँ

तुम

अटोगे नहीं

मेरी मुट्ठी में…

तुम तो आकाश हो

सागर हो, धरती हो

सब कुछ हो

बस

अगर नहीं हो

तो तुम  

 मेरे ‘तुम’ नहीं हो

*

अक्सर 

आते हो 

ख्वाबों की तरह 

सिमटते हो 

पलकों में 

और फिर 

न जाने कब 

ग़ुम  हो जाते हो 

जैसे 

झर गयी हो रेत 

मुट्ठी से ! 

*

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सूरज 

जब थक जाता है 

शाम के काँधे पर 

सिर रख कर सो जाता है 

रात चुपके से

उढ़ा देती है 

तारों जड़ी चुनरी

लगा देती है 

चाँद का सिरहाना 

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1.

परिंदे नहीं 
पर उड़ान तो है 
सपनों में भी 

2.

जाँचों ज़रूर
उड़ान से पहले 
हवा का रूख 

3.

भूलना मत 
उड़ान से पहले 
पर तौलना 

4.

भरो उड़ान 
नापो आकाश, गर 
पंख साथ दें 

5.

उड़ान ही तो 
नहीं है सब कुछ
ज़िंदगी भी है 

-:-

ये हाइकू सरस्वती माथुर जी के चित्र “उड़ान” से प्रेरित

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