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Archive for the ‘माँ अौर बेटी ….’ Category


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मुक्त करो पंख मेरे पिजरे को  खोल दो

मेरे सपनो से जरा पहरा हटाओ तो …

आसमाँ को  छू के मैं तो तारे तोड़ लाऊंगी

एक बार प्यार से हौसला बढाओ तो …

*

 बेटों से नहीं है कम बेटी किसी बात में

सुख हो या दुःख सदा रहती हैं साथ में

वंश सिर्फ बेटे ही चलाएंगे न सोचना

भला इंदिरा थी कहाँ कम किसी बात में

*

बेटियों को बेटियां ही मानो नहीं देवियाँ

पत्थर की मूरत बनाओ नहीं बेटियां

इनसान हैं इनसान बन जीने दो …

हंसने दो रोने दो गाने मुस्कुराने दो

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एक परी थी…..   

छोटे छोटे  सपने बुनकर 

आँखों में पहना देती थी 

उसकी बातों मे जादू था

उसके हाथों में जादू था,

बची हुयी कतरन से भी वो 

गुड़िया नयी बना देती थी 

एक परी थी…..

मैं रोऊँ वो उसके पहले 

चेहरे पे मुस्कान सजा के 

चूमचाम कर फूंक मार कर 

मेरी चोट भुला देती थी 

अपनी प्यारी बातों से वो 

मेरा मन बहला देती थी 

एक परी थी…..

एक रोज़  फिर आंधी आई 

और – परी को उड़ा ले गयी 

मेरे अंदर की बच्ची को 

जीवन भर की सजा दे गयी 

रोज रात को ढूंढ रहीं हूँ 

सपना सपना तारे तारे 

कोई तो हो एक बार जो 

मुझसे मेरी परी मिला दे 

एक परी थी…..

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मेरी माँ मेरी परी… आज एक साल और बीत गया… Miss you mom .. Love you 

 

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माँ की दुआ
बंधीं रहती है
ताबीज सी दिल में
बच्चों के साथ
वो चाहे कहीं भी हो
जब जरा मन उदास हुआ
इक प्यार भरी
थपकी सी लगा देती है
माँ की याद !!

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माँ

माँ

तुम्हारे होने का अर्थ है

बचपन से एक रिश्ता

जो कभी ख़त्म नहीं होता

जब तक तुम होती हो, हम बच्चे ही होते हैं

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लेकिन तुम्हारे जाते ही

छिन जाता है हमारा बचपन

और हम अचानक ही बड़े हो जाते हैं, फिर

तुम्हारे होने न होने के बीच का फर्क जान पाते हैं

 

Miss you माँ ….

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एक सवाल हालात से, समाज से  …

आखिर क्या कमी पड़ जाती है हमारे प्यार में,  बेटियो के प्यारे से रिश्ते में “क्यूँ कमतर हैं बेटियाँ ?” सबकी न सही पर समाज के काफी बड़े तबके की सोच आज भी यही है,  बेटों की चाह मे न जाने कितनी बेटियाँ जन्म से पहले ही मौत की गोद मे सुला दी जाती हैं ….

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माँ के कलेजे की
धड़कन हैं बेटियाँ
बाप के गुरूर का
परचम हैं बेटियां
जीवन की धूप में
छाँव सी हैं बेटियाँ
सुख हो या दुःख
बांटती हैं बेटियाँ

.

यूँ तो बदली है दुनिया
बदला समाज भी, पर
सच पूछो आज भी
बेटों की चाह में
मरती हैं बेटियाँ
जन्म भी गयीं तो
डरती है सांस-सांस
इंसानों के जंगल में
जब तब बेदर्दी से
लुटती हैं बेटियाँ

.

नाजुक से कन्धों पे
बड़े बड़े काम ले
कहीं कल्पना बछेंद्री
सुनीता हैं बेटियाँ
आसमां को छूती हैं
सागर को चीरती हैं
दुनिया को जीतती हैं
जीवन को रोपती हैं
करती हैं साबित
खुद को हमेशा
फिर भी समाज में
क्यूँ कमतर हैं बेटियाँ ?

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मैं बन गयी
एक भरा पूरा दरख़्त
तेरी ममता की छाँव तले
तूने मुझे माँ बना दिया
अपने आने से
मुझे सूरज बना दिया
अपनी चमक से
मुझे फूल बना दिया
अपनी महक से
मुझे सपना बना दिया
अपने ख्याल से
मेरी धडकनों को साँसे दे दीं
अपनी साँसों से
मुझे पूरा कर दिया
मेरे वजूद का हिस्सा बनकर
मैं तो बस एक बूँद थी
तूने मुझे दरिया कर दिया
मेरी बेटी
तूने मुझे मुकम्मल कर दिया

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रोज़ सवेरे वो नन्ही सी चुनमुन 
जगती तो मानो शहर को जगाती 
बाँध के बस्ता निकलती जो घर से 
तो रस्ते में सबको वो चलती पढ़ाती 
** 
फूल हों या पत्ती, या पंछी पखेरू 
सब पर वो अपनी हुकूमत चलाती
नन्ही परी  सी वो इठला के चलती  
दरिया सी  बहती और गुनगुनाती 
** 
बाबा के काँधे पे डाली सी झुकती  
जाने फिर कानों में क्या बड़बड़ाती  
हंसती मचलती औ’ रौनक मचाती 
जीवन में खुशियों के मौसम जगाती 
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जादू छड़ी सी वो मुस्कान उसकी 
हजारों सिंड्रेला का जादू भुलाती 
ऐसी है मेरी वो प्यारी सी बिटिया 
मासूम गुड़िया जो सब दुःख भुलाती 
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