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Archive for the ‘मेरी पसंद’ Category


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आँधियाँ..
ये भला
कहाँ तेज़ चलती हैं
ये तो दिए हैं
बस यूँ ही
शौकिया थरथराते हैं

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बरस महीने दिन 

छोटे छोटे होते 

अदृश्य ही हो जाते हैं 

और मैं 

बैठी रहती हूँ 

अभी भी 

उनको उँगलियों पे 

गिनते हुए 

बार बार 

हिसाब लगाती हूँ 

मगर

जिन्दगी का गणित है कि

सही बैठता ही नहीं

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मुक्त करो पंख मेरे पिजरे को  खोल दो

मेरे सपनो से जरा पहरा हटाओ तो …

आसमाँ को  छू के मैं तो तारे तोड़ लाऊंगी

एक बार प्यार से हौसला बढाओ तो …

*

 बेटों से नहीं है कम बेटी किसी बात में

सुख हो या दुःख सदा रहती हैं साथ में

वंश सिर्फ बेटे ही चलाएंगे न सोचना

भला इंदिरा थी कहाँ कम किसी बात में

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बेटियों को बेटियां ही मानो नहीं देवियाँ

पत्थर की मूरत बनाओ नहीं बेटियां

इनसान हैं इनसान बन जीने दो …

हंसने दो रोने दो गाने मुस्कुराने दो

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अपेक्षाएं

जब प्रेम से

बड़ी होने लगती हैं

तब

प्रेम धीरे धीरे

मरने लगता है

विश्वास

घटने लगता है

प्रेम में तोल-मोल

जांच-परख

घर कर लेती है

तो प्रेम

प्रेम नहीं रह जाता

विश्वास विहीन जीवन

कब असह्य हो जाता है

पता ही नहीं चलता

जब पता चलता है

तब तक

बहुत देर हो चुकी होती है

सिर्फ पछतावा ही

शेष रह जाता है

क्योंकि प्रेम

मर चुका होता है !!

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अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष रूप से  आज की यह कविता उन सबके लिए जो किसी भी संदर्भ मे बस  लड़कियों पर  उनके पहरावे को लेकर टिपण्णी करते हैं और अपने जागरूक होने का परिचय दे कर समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेते हैं। परिधान में शालीनता होनी चाहिए ये बहुत जरुरी है मगर सिर्फ परिधान से ही किसी के चरित्र का आंकलन नहीं किया जाना चाहिए, यह भी उतना ही जरूरी  है।  

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आजकल की लड़कियां 

जरा संभल कर 

ये आजकल की लड़कियां हैं 

इनसे पंगा मत लेना 

‘अरे ये तो आधुनिका है’ 

बदन पे जींस  

और  उस पर 

टॉप भी छोटा सा 

चालू होगी  

यह सोचकर 

कहीं दही के धोखे 

कपास मत निगल जाना

हया इनके लिए 

पांच गज की चद्दर में नहीं 

बल्कि 

इनकी आँखों में पलती है 

चिंगारी की तरह..  

अगर झुके 

तो शर्म बन जाये 

मगर दहके तो ज्वाला

जरा संभल कर 

आगे बढऩा 

इन्हें माल नहीं 

पूजा की आरती समझोगे  

तो दुआ बन के 

जीवन संवार देंगी  

वर्ना भस्म ही कर देंगी 

ये आजकल की लड़कियां हैं 

इनसे पंगा मत लेना 

***

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मिट्टी के घरौंदों को क्या आंधी से डराता है 

ये तो वो हैं, जिन्हें तूफ़ान हर रोज  जगाता है 

..

टूटेंगे बिखरेंगे..  और फिर से बनेंगे 

फितरत है ये इनकी गिर गिर के उठेंगे

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कई बार मैने ऐसा महसूस किया है कि सब का नहीं मगर जादातर का अभी भी देहरी के इस तरफ का सच कुछ और और उस तरफ कुछ और ही है । बस उसी सोच से उपजी है यह रचना

उन सबसे अग्रिम क्षमा चाहती हूँ जो इस सोच से इत्तेफाक नहीं रखते ।

औरतें 

पहले भी दोयम थीं 

आज भी दोयम ही हैं 

पढ़ी लिखी हों 

या बेपढ़ी

अक्सर 

देखा है कि 

घर के बाहर 

एकदम टिप-टॉप… 

स्त्री विमर्श की बातों का 

पुलंदा बांधे 

बहस मुबाहिसे के 

जिरह-बख्तर से लैस 

औरतों के हक़ पर 

जोशीला भाषण देने वाली 

टीवी और फिल्मों में 

नारी स्वातंत्र्य पर 

धधकती हुयी विचारधारा 

प्रस्तुत करने वाली औरतें भी 

मानें या न मानें

मगर जादातर

घर की दहलीज से अंदर आते ही 

दोयम के खोल मे ही

लिपट जाती हैं

……

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