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Archive for the ‘मेरी पसंद’ Category


हो सके तो खुद को इंसान बनाए रखिये 

चुटकी भर संवेदना दिल में बचाए रखिये 

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यूँ तो ये, आज के दौर में ज़रा मुश्किल है 

तो भी क्या हर्ज़ है खुद को आजमाए रहिये   

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आज कल हालात हद  से  बदतर है 

हर आस्तीं में सांप बगल में खंजर है

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क्या पता कौन कहाँ दुश्मन निकल आए 

खुद को हर वक्त, पहरे पे लगाए रखिये

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आँख के बदले आँख

जान के बदले में जान  

दया, क्षमा और अहिंसा में 

अब हम विश्वास नहीं करते न  

होता है सारा जहाँ अँधा तो होने दो 

बनती है सारी धरा मरघट तो बनने दो 

 अँधा बांटे रेवड़ी फिर-फिर अपने को दे

न होगा कोई और न पूछेगा कोई सवाल 

जिसका भी हो होगा मगर होगा 

बस अखंड एकक्षत्र राज्य 

यही तो चाहते हैं न हम  

अहम् ब्रम्हास्मि  

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मैं चिराग़ हूँ उम्मीद का मुझे देर तक जलाए रखना
हवाएँ तो होंगी तुम हथेलियों की ओट बनाए रखना

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तूफ़ान तो होंगे ज़माने में बहुत मैं डर भी जाऊँ शायद
तू मुझे थाम के मेरे क़दमों को धरती पे जमाये रखना

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आँधियाँ..
ये भला
कहाँ तेज़ चलती हैं
ये तो दिए हैं
बस यूँ ही
शौकिया थरथराते हैं

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बरस महीने दिन 

छोटे छोटे होते 

अदृश्य ही हो जाते हैं 

और मैं 

बैठी रहती हूँ 

अभी भी 

उनको उँगलियों पे 

गिनते हुए 

बार बार 

हिसाब लगाती हूँ 

मगर

जिन्दगी का गणित है कि

सही बैठता ही नहीं

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मुक्त करो पंख मेरे पिजरे को  खोल दो

मेरे सपनो से जरा पहरा हटाओ तो …

आसमाँ को  छू के मैं तो तारे तोड़ लाऊंगी

एक बार प्यार से हौसला बढाओ तो …

*

 बेटों से नहीं है कम बेटी किसी बात में

सुख हो या दुःख सदा रहती हैं साथ में

वंश सिर्फ बेटे ही चलाएंगे न सोचना

भला इंदिरा थी कहाँ कम किसी बात में

*

बेटियों को बेटियां ही मानो नहीं देवियाँ

पत्थर की मूरत बनाओ नहीं बेटियां

इनसान हैं इनसान बन जीने दो …

हंसने दो रोने दो गाने मुस्कुराने दो

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अपेक्षाएं

जब प्रेम से

बड़ी होने लगती हैं

तब

प्रेम धीरे धीरे

मरने लगता है

विश्वास

घटने लगता है

प्रेम में तोल-मोल

जांच-परख

घर कर लेती है

तो प्रेम

प्रेम नहीं रह जाता

विश्वास विहीन जीवन

कब असह्य हो जाता है

पता ही नहीं चलता

जब पता चलता है

तब तक

बहुत देर हो चुकी होती है

सिर्फ पछतावा ही

शेष रह जाता है

क्योंकि प्रेम

मर चुका होता है !!

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