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Archive for the ‘मेरी पसंद’ Category


…. 

उठो

सीधी खड़ी हो

और खुद पर यकीन करो 

तुम किसी से कम नहीं हो 

तुम झूठे पौरुष के दंभ का शिकार 

जानवरों का शिकार तो

बिलकुल नहीं बनोगी

तुम जिंदगी में 

किसी से नहीं डरोगी ….

*** 

 

अपने

पैरों के नीचे की जमीन 

और सर के ऊपर का आसमान 

तुम खुद तलाश करोगी 

तुम्हे अपनी जिंदगी से जो चाहिए

उसके होने न होने की राह भी 

तुम खुद तय करोगी

तुम जिंदगी में 

किसी से नहीं डरोगी ….

***

 

रिश्तों का मोल 

तुम खूब पहचानती हो 

इनको निभाने का सलीका भी 

खूब जानती हो लेकिन 

तुम कमजोर नहीं हो

अपने स्वाभिमान की कीमत पर 

तुम कुछ नहीं सहोगी  

तुम जिंदगी में  

किसी से नहीं डरोगी ….

***

 

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कोरोना के भय ने सारे समीकरण उल्टे-पुल्टे कर दिए हैं । अब देखिए न कहाँ तो लोगों को हिल-मिल कर साथ-साथ रहने को कहा जाता था और आज सबको सोशल डिस्टेंसिंग रखने को कहा जा रहा है,  एक दूसरे से दूर-दूर रहने की हिदायत दी जा रही है । इसी जमीन पर यह एक शेर बना है…

जऱा सा फ़सला रखिए जनाब हर किसी से 

बहुत नजदीक अाएँगे तो साँसे रूठ जाएँगी

Stay Home, Be Safe, Protest Yourself and Protect Community

 

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मुश्किलें 

हों तो क्या 

हमने 

अपनी मुट्ठी में 

जो उम्मीदें बाँध रखी हैं 

उन्हें जिन्दा रहने के लिए 

साँसों की गर्मी और 

आसुंओं की नमी दी है ….

देखना

इनमे एक दिन 

अंकुर फूटेंगे और 

ये परवान भी चढ़ेंगी 

और फिर 

सूरज के दरवाजे पर 

दस्तक देंगी 

उस दिन दूर होगा अंधेरा !!

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हवाएँ हैं…. 

हवाओं की..  कोई सरहद नहीं होती
ये तो सबकी हैं बेलौस बहा करती हैं
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हवाएँ हैं, ये कब किसी से डरती हैं
जहाँ भी चाहें बेख़ौफ़ चला करती हैं
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चाहो तो कोशिश कर के देख लो मगर
बड़ी ज़िद्दी हैं कहाँ किसी की सुनती हैं
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हवाएँ न हों तो क़ायनात चल नहीं सकती
इन्ही की इनायत है कि जिंदगी धड़कती है
**

 

बेलौस – निस्वार्थ, बिना किसी भेदभाव के

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हो सके तो खुद को इंसान बनाए रखिये 

चुटकी भर संवेदना दिल में बचाए रखिये 

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यूँ तो ये, आज के दौर में ज़रा मुश्किल है 

तो भी क्या हर्ज़ है खुद को आजमाए रहिये   

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आज कल हालात हद  से  बदतर है 

हर आस्तीं में सांप बगल में खंजर है

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क्या पता कौन कहाँ दुश्मन निकल आए 

खुद को हर वक्त, पहरे पे लगाए रखिये

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***

आँख के बदले आँख

जान के बदले में जान  

दया, क्षमा और अहिंसा में 

अब हम विश्वास नहीं करते न  

होता है सारा जहाँ अँधा तो होने दो 

बनती है सारी धरा मरघट तो बनने दो 

 अँधा बांटे रेवड़ी फिर-फिर अपने को दे

न होगा कोई और न पूछेगा कोई सवाल 

जिसका भी हो होगा मगर होगा 

बस अखंड एकक्षत्र राज्य 

यही तो चाहते हैं न हम  

अहम् ब्रम्हास्मि  

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मैं चिराग़ हूँ उम्मीद का मुझे देर तक जलाए रखना
हवाएँ तो होंगी तुम हथेलियों की ओट बनाए रखना

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तूफ़ान तो होंगे ज़माने में बहुत मैं डर भी जाऊँ शायद
तू मुझे थाम के मेरे क़दमों को धरती पे जमाये रखना

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आँधियाँ..
ये भला
कहाँ तेज़ चलती हैं
ये तो दिए हैं
बस यूँ ही
शौकिया थरथराते हैं

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बरस महीने दिन 

छोटे छोटे होते 

अदृश्य ही हो जाते हैं 

और मैं 

बैठी रहती हूँ 

अभी भी 

उनको उँगलियों पे 

गिनते हुए 

बार बार 

हिसाब लगाती हूँ 

मगर

जिन्दगी का गणित है कि

सही बैठता ही नहीं

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मुक्त करो पंख मेरे पिजरे को  खोल दो

मेरे सपनो से जरा पहरा हटाओ तो …

आसमाँ को  छू के मैं तो तारे तोड़ लाऊंगी

एक बार प्यार से हौसला बढाओ तो …

*

 बेटों से नहीं है कम बेटी किसी बात में

सुख हो या दुःख सदा रहती हैं साथ में

वंश सिर्फ बेटे ही चलाएंगे न सोचना

भला इंदिरा थी कहाँ कम किसी बात में

*

बेटियों को बेटियां ही मानो नहीं देवियाँ

पत्थर की मूरत बनाओ नहीं बेटियां

इनसान हैं इनसान बन जीने दो …

हंसने दो रोने दो गाने मुस्कुराने दो

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