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Archive for the ‘सामाजिक सरोकार’ Category


कोरोना के भय ने सारे समीकरण उल्टे-पुल्टे कर दिए हैं । अब देखिए न कहाँ तो लोगों को हिल-मिल कर साथ-साथ रहने को कहा जाता था और आज सबको सोशल डिस्टेंसिंग रखने को कहा जा रहा है,  एक दूसरे से दूर-दूर रहने की हिदायत दी जा रही है । इसी जमीन पर यह एक शेर बना है…

जऱा सा फ़सला रखिए जनाब हर किसी से 

बहुत नजदीक अाएँगे तो साँसे रूठ जाएँगी

Stay Home, Be Safe, Protest Yourself and Protect Community

 

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देश मेरी तुम्हारी या किसी की जागीर नहीं है

देश कागज पर कोई खींचीं हुई लकीर नहीं है 

देश न ही कुछ मुट्ठी भर लोगों की विरासत है

देश न ही केवल और केवल बस सियासत है

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देश वो मिटटी है जो गढ़ती है हमें रचती है 

देश वो खुश्बू है जो रग – रग में बसती है  

देश वो नाम है जो दुनिया में नाम देता है 

देश ही तो है जो एक पहचान हमें देता है 

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देश की माटी को अब यूँ न लजाओ 

देश के नाम पर अपनों का ही खूं न बहाओ  

देश के नाम पर अपने मतलब न सधाओ

देश को देश ही रहने दो खिलौना न बनाओ

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हर तरफ

सय्याद ही सय्याद हैं

बुलबुल बिचारी क्या करे …

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कोख हो या

घर हो बाबुल का

या हो बाहर की दुनिया

हर तरफ

गिद्धों का फैला जाल है

बुलबुल बिचारी क्या करे …

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वहशियों की 

भीड़ है हर गली कूचे 

शहर हर गाँव में 

नोच कर 

खाने को सब तैयार हैं 

बुलबुल बिचारी क्या करे …

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आज हमारा समाज बुरी तरह से दरिंदगी के पंजों में जकड़ा हुआ है।  छोटी छोटी बच्चियों पर, औरतों पर होने वाले रोज रोज के इन पाशविक अत्याचारों से सब आहत हैं।  सोशल मीडिया, मीडिया सब जगह उफनता गुस्सा, बात-चीत, बहस लेकिन सब बेनतीजा 

सच तो यही है कि ज्यादातर लोग इन हालात में सुधार चाहते हैं लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हैं जो इसको धर्म और राजनीति का रंग देने की कोशिश करते हैं और असल समस्या को कहीं पीछे धकेल देते हैं।  ऐसा वो जानबूझ कर करते हैं या अनजाने में, ये तो वो ही जानें, उनका ज़मीर जाने लेकिन उनकी इस हरकत से अपराधी अधिकतर बच कर निकल जाते हैं।  इस सन्दर्भ में उन सब से निवेदन है कि समस्या से उसके मूल रूप में ही सीधे सीधे निपटने की नीति अपनाइये, उसमे और मुद्दे जोड़ कर उसको भटकाइए मत 

सरकार और न्याय व्यस्था को अपना काम करने दीजिये लेकिन यदि आप समाज में फैली इस विकृत मानसिकता के खिलाफ सचमुच कुछ करना चाहते हैं, बलात्कारियों को सजा देना चाहते हैं तो एक तरीका यह भी हो सकता है

  • पीड़िता की नहीं बल्कि अपराधी की तस्वीर और परिचय सार्वजनिक कीजिये 

  • अपराधी का पूर्ण रूप से सामाजिक बहिष्कार कीजिये

  • अपराधी को बेटा, भाई, पति दोस्त या रिश्तेदार नहीं सिर्फ अपराधी समझिये। अपनी जवाबदेही नैतिकता और इंसानियत के प्रति रखिये 

  • घर-परिवार, मित्र, नातेदार-रिश्तेदार, दुकानदार, वकील, डॉक्टर, अर्थात सम्पूर्ण समाज, सब  मिलकर  अपराधी का बहिष्कार कीजिये 

  • अपने आस पास अपनी नजर के दायरे में उनको खड़ा मत होने दीजिये उनसे बात मत कीजिये, किसी प्रकार का कोई संबंध मत रखिये 

  • उनको किसी भी कीमत पर, किसी भी प्रकार की सेवाएं मुहैय्या मत करवाइये 

  • उपरोक्त किसी भी बात को करने के लिए आपको किसी सरकारी सहयोग की आवश्यकता नहीं है, बस अपनी अंतरआत्मा को जगाइए इतना ही काफी है   

सामाजिक बहिष्कार सदियों पुरानी दंड व्यस्था है और पूर्णतया मानवीय होते हुए भी अत्यंत प्रभावशाली है, शर्त यही है कि सम्पूर्ण समाज एक साथ मिल कर एक जुट हो कर करे। 

यदि आप उपरोक्त में से कुछ भी नहीं कर सकते तो अपनी निष्क्रियता के चलते स्वयं को भी अप्रत्यक्ष रूप से अपराध में शामिल समझिये।  

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आँख के बदले आँख

जान के बदले में जान  

दया, क्षमा और अहिंसा में 

अब हम विश्वास नहीं करते न  

होता है सारा जहाँ अँधा तो होने दो 

बनती है सारी धरा मरघट तो बनने दो 

 अँधा बांटे रेवड़ी फिर-फिर अपने को दे

न होगा कोई और न पूछेगा कोई सवाल 

जिसका भी हो होगा मगर होगा 

बस अखंड एकक्षत्र राज्य 

यही तो चाहते हैं न हम  

अहम् ब्रम्हास्मि  

-:-

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ये गूंगी मूर्तियाँ

जब से बोलने लगी हैं

न जाने कितनों की

सत्ता डोलने लगी है

जुबान खोली है

तो सज़ा भी भुगतेंगी

अब छुप छुपा कर नहीं

सरे आम…

खुली सड़क पर

होगा इनका मान मर्दन

कलजुगी कौरवों की सभा

सिर्फ ठहाके ही नहीं लगाएगी

बल्कि वीडियो भी बनाएगी

अपमान और दर्द की इन्तहा में

ये मूर्तियाँ

फिर से गूंगी हो जाएँगी

नहीं हुईं तो

इनकी जुबानें काट दी जाएँगी

मगर अपनी सत्ता पर

आँच नहीं आने दी जाएगी

-:-

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चिड़िया  …. 

तुम सुन रही हो न 

घोंसले की 

दहलीज के बाहर 

आँधियाँ ही आँधियाँ हैं 

हर तरफ 

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नोचने को पर तुम्हारे

उड़ रहे हैं 

गिद्ध ही गिद्ध यहाँ  

हर तरफ 

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पैने करने होंगे 

अपने ही नाख़ून तुमको 

कोई नहीं आएगा बचाने  

मुखौटों के अंदर 

बस कायरों की 

भीड़ ही भीड़ है यहाँ 

हर तरफ 

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सरे आम होने वाले अपराधों को लोग कैसे तमाशाई बनकर देखते रहते हैं, आखिर हमे हो क्या गया है… हम जिन्दा भी हैं या नहीं, आत्म विश्लेषण की बहुत जरूरत है 

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आपने कभी सुनयोजित तरीके से किसी को पागल करार देने का ड्रामा फिल्मों में देखा है, खास तौर से हिंदी फिल्मों में ।  जरूर देखा होगा जहाँ किसी एक व्यक्ति को चार लोग मिल कर पागल-पागल  कहते हैं, शुरू शुरू में तो वो सामान्य ढंग से कहता है मैं पागल नहीं हूँ, लेकिन बार बार कहने पर उसको गुस्सा आ जाता है, फिर धीरे धीरे  वो चीखने चिल्लाने लगता है, कभी कभी तो मारने को भी उतारू हो जाता है और  उसकी यह हालत देख कर  सब ये मान लेते हैं कि वो सचमुच पागल है और बस फिर क्या… उन लोगों का मकसद पूरा हो जाता है जो उसे पागल करार देना चाहते थे, जबकि यह सब एक सुनियोजित षडयंत्र था, इसमें उस व्यक्ति की मानसिक स्थिति का कुछ लेना देना था ही नहीं

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ऐसा ही हमारी राजनीति में भी है।  यहाँ भी  बहुत सुनयोजित तरीके से किसी की छवि बनायी या बिगाड़ी जाती है।  ऐसा ही कुछ शायद राहुल गाँधी के साथ सोशल मीडिया के माध्यम से किया गया।  बहुत ही सुनियोजित तरीके से एक सोची समझी साजिश की तरह उनकी छवि को मजाक का पुलिंदा बनाने का काम किया गया।  यह मैं यूँ ही हवा में नहीं कह रही हूँ आज मैंने एक पुरानी खबर पढ़ी जहाँ से यह विचार आया।

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आज अचानक wall Street Journal के ब्लोग के बहुत पुराने अंक में एक खबर पर नजर पड़ी और उसमे जो खबर मैंने पढ़ी मुझे लगा कहीं मैं कुछ गलत तो नहीं देख रही हूँ, लेकिन नहीं यह खबर तो सचमुच राहुल गाँधी के बारे में ही थी।  जिसमे उन्होंने उस विचारधारा को हकीकत में बदलने की कोशिश की बात की थी जो हम सब कभी न कभी सोचते हैं या कहते हैं और वो बात … यह है कि राजनीति में खासतौर पर चुनाव प्रत्याशी बनने के लिए एक निश्चित पात्रता का मापदंड होना चाहिए जिससे उनकी योग्यता और अभिरुचि के आधार पर ही उनका चुनाव किया जा सके और एक सुयोग्य प्रत्याशी ही चुनाव लड़ सके।  wall Street Journal की यह खबर जो 2013 में छपी थी जिसमे राहुल गाँधी ने Entrance Test for Congress Candidates की बात की है, इस बात की तस्दीक करती है कि उनकी मंशा राजनीति  में कुछ अच्छा करने की थी। लेकिन लखनऊ कानपुर की भाषा में कहें तो राजनीति के धुरंधरों ने, जिसमे दूसरी पार्टियों के साथ साथ उनकी अपनी पार्टी के भी वो लोग शामिल रहे होंगे जिनको शायद युवा शक्ति से अपने लिये कुछ खतरा महसूस हुआ होगा, उनको नक्कू बना दिया, उनकी कम उम्र को जान बूझकर उनकी कमअक्ली कारार देने का ड्रामा रचा गया  और इस झूठ को इतनी बार दोहराया गया कि वो सच लगने लगा और शायद पागल साबित करने वाले फ़िल्मी सीन वाला किस्सा यहाँ भी हो गया।

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इस लेख के आखिर में  उस खबर का लिंक है आप सब भी पढ़िए और देखिये और एक पल के लिए निष्पक्ष होकर सोचिये कि अगर राहुल गाँधी का यह सुझाव सिर्फ कांग्रेस में ही नहीं बल्कि हर पार्टी में लागू  हो जाता और देश की राजनीति में पात्रता के मापदंड के आधार पर चुनाव प्रत्याशी के रूप में सुयोग्य व्यक्तियों का चयन किया जाता तो देश का, जनता जनार्दन का कुछ भला ही होता

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ये रहा लिंक उस खबर का आप भी पढ़ कर देखिये

Entrance Test for Congress Candidates

AGENCE FRANCE-PRESSE/GETTY IMAGES

Congress party Vice President Rahul Gandhi has created a five-page test to shortlist candidates seeking to contest elections for his party.

India’s ruling-Congress party has decided to test the knowledge of hopefuls who wish to contest assembly elections due later this year.

A five-page application form, prepared by Rahul Gandhi, the Congress party’s vice president, requires ticket-seekers to answer questions mostly related to social, political and demographic issues in the constituency where the applicant hopes to contest elections.

Assembly elections are due later this year in the states of Madhya Pradesh, in central India, Rajasthan, in the west, Chhattisgarh, in the east, Delhi in the north and Mizoram in the north east.

Aspirants will be asked to give details about their personal background including caste and assets, whether they have a criminal record or any business background, Congress party lawmaker, Madhu Goud Yaskhi, told India Real Time Tuesday. He added that caste would not be a deciding factor in choosing candidates.

They’ll also have to detail whether they have previously contested elections, give a statement of purpose and their social and political achievements in the designated constituency, In addition, they will have to explain if they were ever suspended from the party or quit themselves, said Mr. Yaskhi.

“This is the democratic way of shortlisting candidates,” Mr. Yashki added. “The response will allow assessors to evaluate personality traits and other aspects of the potential candidate and open the party’s gates for anyone with a clean background,” he said.

The application form will be filled in by Congress party observers – office bearers at the local, district and state levels – according to information given by party ticket-seekers. Once the form is completed and submitted, it will be closely studied by the Congress party’s local-level officers who will then send their recommendation to the party’s central leadership.

The Congress party’s state units will have a “decisive say” in the selection of candidates since “they know the candidates’ merit better” than the party’s leaders at the national level, Mr. Yashki said.

For this, Congress is training its team of local leaders across the country by organizing workshops on different issues, Mr. Yashki said.

The program comes against the backdrop of a recent order by India’s Supreme Court that disqualified politicians from contesting national and state elections from prison.

nationwide survey conducted in July by the Association for Democratic Reforms, a New Delhi-based advocacy group for transparency in governance, showed nearly one-third of members of the lower house of Parliament, or Lok Sabha, and an almost equal number of state legislators, have criminal cases, including kidnapping, robbery, murder and rape, pending against them.

Mr. Yashki said the application forms are “just one of the party’s ideas to make the selection process more transparent.”

Still, political experts and opposing parties are doubtful this will deter aspirants from influencing local leadership in the selection process.

“The idea is good. But much of it will depend on how the party manages to objectively evolve a method that ensures transparency,” said Navnita Chadha Behera, professor in the department of political science at Delhi University.

She said there would be “layers of intermediaries” within the party, with a greater say in selection of candidates. “The biggest challenge will be how honest these people remain in choosing the right candidates,” Ms. Behera said.

The main opposition Bharatiya Janata Party dismissed it as an “unrealistic” program.

“This type of exercise cannot help a party that has been in power for last nine years and achieved nothing,” BJP’s vice president Mukhtar Abbas Naqvi told India Real Time Tuesday.

Moreover, “selection of a particular candidate does not ensure he is going to win elections,” Mr. Naqvi added.

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 कबीर जयंती के अवसर पर उस महान समाज सुधारक को शत शत नमन ! 

कबीर आज भी उतने ही प्रासंगिक  हैं जितने कि  आज से सैकड़ों साल पहले थे।  कबीर किसी एक व्यक्ति का नाम नहीं है, कबीर तो एक सोच है जो समाज में फैली हुयी बुराइयों का प्रतिरोध करने के लिए जन्म लेती है।

और प्रतिरोध की परंपरा सनातन है, जब जब राजनीति  में प्रतिबद्धता का क्षय अपने चरम पर पहुँचता है, तब एक कबीर का जन्म होता ही है।  दूसरे को दुर्बल और स्वयं को प्रबल घोषित करने की उत्कट इच्छा ही इस प्रतिरोध की शक्ति को जन्म देती है।

कबीर ने किसी नियम और विधा के अंतर्गत साहित्य रचने के लिए कभी कुछ नहीं कहा उन्होंने तो जो देखा, जो भोगा, अपने आस-पास जो महसूस किया उसे ही सहज सरल बोलचाल की भाषा में कह दिया, लेकिन उनकी वो दिल से निकली बातें सीधे दिलों तक पहुंची और एक विचारधारा बन गईं।  वो विचारधारा जो आंधी बन कर चली और तमाम तात्कालीन गतिरोधों के बावजूद, अपनी पूरी ताकत से समाज में व्याप्त गन्दगी को बहाकर दूर  ले गयी

एक कवि जिस सहजता और सरलता से अपनी कविता के माध्यम से बात को जन जन के मानस तक पहुँचा सकता है वो शायद और किसी माध्यम से उतना आसान नहीं, बस शर्त ये है कि कवि को खुद से ईमानदार होना चाहिये । यूं तो आज भी बहुत से ऐसे कवि हैं जिन की कविता समाज में फैली बुराइयों और कुरीतियों पर चोट करती है, लेकिन उनको राजनीतिक रंग देकर पटल से हटाने की पूरी कोशिश की जाती है ।

कबीर के समय  में भी समाज राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक सभी दृष्टियों से विघटन की ओर जा रहा था और आज भी वही हो रहा है।  आज भी समाज उसी तरह के संक्रमण के दौर से गुजर रहा है,  अव्यवस्था, भृष्टाचार कुशासन एवं अस्तव्यस्तता अनेक प्रकार के आडंबर, कुप्रथाओं एवं अंधविश्वास से बुरी तरह से घिरा हुआ है। 

कबीर युगद्रष्टा थे, उन्होने वर्ण व्यवस्था, अन्धविश्वास, धार्मिक आडम्बर जैसी कुरीतियों का विरोध करके समाज में व्याप्त द्वेष को मिटा कर साफ किया था। सच कहें तो आज फिर एक कबीरवादी विचारक की जरूरत है जो समाज मे व्याप्त गंदगी को, विसंगतियों को बिना किसी भेदभाव के हर जाति, हर वर्ग मे से धो-पोंछ कर साफ कर सके ।

सब के लिये एक बात, एक नियम और एक कायदा, इस सन्दर्भ मे  अभी हाल मे ही देखा हुआ डा. कुमार विश्वास का एक वीडियो याद आता है उसमे एक पंक्ति कही है उन्होने कि “ राजनीति का धर्म निभाओ लेकिन धर्म की राजनीति मत करो” , यह बात किसी भी लाग लपेट से परे कहीं न कहीं उसी कबीर वादी विचारधारा का ही हिस्सा लगती है। इसी सोच की, ऐसी सशक्त बानियों की आज के समय मे समाज को बहुत आवश्यकता है । हो सकता है उनकी और बहुत सी बातों में शायद मेरा मतैक्य न हो लेकिन इस बात से मैं शतप्रतिशत सहमत हूं कि राजनीति में बैठे हुये लोगों को जाति और धर्म के भेद को परे रखकर ही अपने राजनीतिक दांव पेंच चलें इसके लिये किसी खास दर्शन या शिक्षा की जरुरत नहीं है बल्कि सर्वधर्म समभाव से सबके भले की भावना हृदय में रखने भर की जरूरत है।

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