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मन के 

आँगन की 

दीवारों पर… 

न जाने कहाँ कहाँ 

कौन कौन सी दरार ढूंढ कर 

उग आती हैं यादें 

और धीरे धीरे 

पीपल सी जड़ें जमा लेती हैं 

फिर एक दिन 

ढह जाती है आँगन की दीवार 

और यादें दफ़न हो जाती हैं 

अपने ही बोझ तले 

*

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बरस महीने दिन 

छोटे छोटे होते 

अदृश्य ही हो जाते हैं 

और मैं 

बैठी रहती हूँ 

अभी भी 

उनको उँगलियों पे 

गिनते हुए 

बार बार 

हिसाब लगाती हूँ 

मगर

जिन्दगी का गणित है कि

सही बैठता ही नहीं

.

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-:-

मुक्त करो पंख मेरे पिजरे को  खोल दो

मेरे सपनो से जरा पहरा हटाओ तो …

आसमाँ को  छू के मैं तो तारे तोड़ लाऊंगी

एक बार प्यार से हौसला बढाओ तो …

*

 बेटों से नहीं है कम बेटी किसी बात में

सुख हो या दुःख सदा रहती हैं साथ में

वंश सिर्फ बेटे ही चलाएंगे न सोचना

भला इंदिरा थी कहाँ कम किसी बात में

*

बेटियों को बेटियां ही मानो नहीं देवियाँ

पत्थर की मूरत बनाओ नहीं बेटियां

इनसान हैं इनसान बन जीने दो …

हंसने दो रोने दो गाने मुस्कुराने दो

-:-


-:-

अपेक्षाएं

जब प्रेम से

बड़ी होने लगती हैं

तब

प्रेम धीरे धीरे

मरने लगता है

विश्वास

घटने लगता है

प्रेम में तोल-मोल

जांच-परख

घर कर लेती है

तो प्रेम

प्रेम नहीं रह जाता

विश्वास विहीन जीवन

कब असह्य हो जाता है

पता ही नहीं चलता

जब पता चलता है

तब तक

बहुत देर हो चुकी होती है

सिर्फ पछतावा ही

शेष रह जाता है

क्योंकि प्रेम

मर चुका होता है !!

-:-

चाँद


-:-

अरे .. 

हमने तुम्हे 

चाँद क्या कह दिया

तुम तो सच मे दूर जा बैठे

-:-

 

 


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अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष रूप से  आज की यह कविता उन सबके लिए जो किसी भी संदर्भ मे बस  लड़कियों पर  उनके पहरावे को लेकर टिपण्णी करते हैं और अपने जागरूक होने का परिचय दे कर समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेते हैं। परिधान में शालीनता होनी चाहिए ये बहुत जरुरी है मगर सिर्फ परिधान से ही किसी के चरित्र का आंकलन नहीं किया जाना चाहिए, यह भी उतना ही जरूरी  है।  

*

आजकल की लड़कियां 

जरा संभल कर 

ये आजकल की लड़कियां हैं 

इनसे पंगा मत लेना 

‘अरे ये तो आधुनिका है’ 

बदन पे जींस  

और  उस पर 

टॉप भी छोटा सा 

चालू होगी  

यह सोचकर 

कहीं दही के धोखे 

कपास मत निगल जाना

हया इनके लिए 

पांच गज की चद्दर में नहीं 

बल्कि 

इनकी आँखों में पलती है 

चिंगारी की तरह..  

अगर झुके 

तो शर्म बन जाये 

मगर दहके तो ज्वाला

जरा संभल कर 

आगे बढऩा 

इन्हें माल नहीं 

पूजा की आरती समझोगे  

तो दुआ बन के 

जीवन संवार देंगी  

वर्ना भस्म ही कर देंगी 

ये आजकल की लड़कियां हैं 

इनसे पंगा मत लेना 

***


मेरी मातृ भाषा हिंदी है और मुझे, हिंदी बोलने में बहुत गर्व होता है।  पिछले 15 वर्षों से अमेरिका में हूँ लेकिन आज भी घर में मेरी बोलचाल की भाषा हिंदी ही है।  जब जहाँ  कुछ हिंदी भाषी इकट्ठे होते हैं हम हिंदी में ही बात करते हैं, ये अलग बात है कि रोज की बातचीत में काफी अंग्रेजी के शब्द भी शामिल हो जाते हैं 

इस बात का बहुत दुःख होता है कि आज़ादी के इतने सालों के बाद भी आज भी हिंदी अपने ही घर में उपेक्षा की शिकार है। हिंदी अपने ही घर में सौतेला व्यवहार झेल रही है। और अंग्रेजी… विदेशी हो कर भी  अपनी पूरी ठसक के साथ भारत की सभी भाषाओं के बीच उच्च पद पर आसीन है। जानते तो सब हैं कि देश को एक सूत्र में पिरोने वाली भाषा हिंदी हो सकती है। घर के यानी कि देश के बाहर, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हिन्दी ही इकलौती भाषा है जो हमारे हिन्दुस्तानी होने की पहचान मानी जाती है लेकिन फिर भी अखंड राष्ट्र भारत वर्ष की पहचान एक भाषा हो, आगे बढ़ कर ये अलख जगाने का साहस कोई नहीं दिखाता। किसी भी राजनेता को ये कोई जरूरी मुद्दा नहीं लगता।

हिंदी राजभाषा, संपर्क भाषा और राष्ट्रभाषा के तौर पर इस बहुभाषी देश को एकता के सूत्र में बांधने का काम कर सकती है। हिन्दुत्व का डंका बजाने वाली हमारी वर्तमान केंद्र सरकार को चाहिए कि वह हिंदी भाषा का प्रचार-प्रसार करे, उसका विकास करे, जिससे संपूर्ण भारतवर्ष की अभिव्यक्ति का माध्यम एक ही भाषा बन सके।

हिन्दी को जन जन की भाषा बनाने के लिये ख़ास तौर पर अहिन्दी भाषियों को हिन्दी से जोडऩे के लिए, हिन्दी को सरल और सुगम रखना होगा, अनावश्यक रोक-टोक, नियमों के बँधनो से मुक्त करना होगा। हिन्दी को उन्मुक्त रूप से स्वाभाविक वातावरण में फलने फूलने दीजिये बोनसाई मत बनाइये। हिन्दी प्रेमियों से एक विनम्र निवेदन है कि जो हिन्दी/अहिन्दी भाषी, हिन्दी बोलने की शुरुआत करना चाहते हैं  उनको अति शुद्धता के फेर मे डाल कर हिन्दी से दूर मत कीजिये। 

सभी को अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस की बहुत बहुत शुभकामनाएँ !