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मुश्किलें 

हों तो क्या 

हमने 

अपनी मुट्ठी में 

जो उम्मीदें बाँध रखी हैं 

उन्हें जिन्दा रहने के लिए 

साँसों की गर्मी और 

आसुंओं की नमी दी है ….

देखना

इनमे एक दिन 

अंकुर फूटेंगे और 

ये परवान भी चढ़ेंगी 

और फिर 

सूरज के दरवाजे पर 

दस्तक देंगी 

उस दिन दूर होगा अंधेरा !!

___



सपने 

ख़ुद नहीं बनते

उन्हें  बीजना पड़ता है 

फिर सींचना पड़ता है 

उम्मीद की बारिश में

 कभी – कभी तो 

पूरा जीवन बीत जाता है 

उन्हें पोसते पोसते 

लेकिन अंकुर नहीं फूटते

शायद जिन्दगी जीने का  

हुनर ही भूल गए …

 


.

ग़लत या सही

शायद ऐसा

कुछ होता ही  नहीं

होता है तो बस

परिस्थितियों को

अपने अपने ढंग से

देखने का नज़रिया 

लेकिन फिर भी

जब अन्दर ही अन्दर

कुछ टूटने सा लगता है

और, आस-पास

कोई नहीं होता

उस पीड़ा को

बाँटने के लिए

तो लगता है

हम नाहक ही जिए

कौन है अपना

क्या व्यर्थ ही भागते रहे

रिश्तों के लिए

.
 

.

एक बात कहें 

हमने ये जो ज़रा सा 

खुला आसमान देखा है न  

इसके लिए हमने 

बहुत जद्दोज़हद की है

वर्ना  तुमने तो 

पर उगने से पहले ही 

हमें जिबह करने में 

कोई कसर कहाँ छोड़ी थी

खैर

कोई बात नहीं 

बरसों से जमे ग्लेशियर 

अब पिघल गए हैं 

हमारे ऊपर की सब बर्फ 

बह गई है

धूप भी निकल आई है

हमारे परों में भी 

नई जान आई ही समझो 

ज़रा ठहरो 

फिर देखना हमारी परवाज़ 

हमारी मंज़िल आसमान है 

.

.


.

उड़ने की स्वतंत्रता 

और परों को उड़ान 

एक बार दे कर तो देखो

फिर देखना हमारा हौसला 

पूरा का पूरा आसमान 

ला कर ही न थमा दें 

तुम्हारे हाथों में तो कहना…

.


आज रात चाँद
ज़रा देर से
खिड़की पर आया
था भी कुछ अनमना सा
पूछा …. तो कुछ बोला नहीं
शायद उसने सुना नहीं
या फिर अनसुनी की
राम जाने….
लेकिन ये तो तय है
था उदास, चेहरा भी
कुछ पीला पीला सा ही लगा
यूँ ही थोड़ी देर
इधर उधर पहलू बदलते
बादलों की ओट में
छुपते छुपाते
न जाने कब
चुपके से नीचे उतर
झील में जा बैठा शायद रो रहा था


.

.

१. 

देखो गुलाल 

उड़ा गया सूरज 

शर्माई शाम 

२. 

लाली का टीका 

साँझ के माथे पर 

धरा सूर्य ने 

३. 

भेजी नभ ने 

सितारों की चुनरी 

शाम सजेगी 

४. 

आई है शाम 

बदली धरती ने 

नारंगी साड़ी 

५. 

लाल गगन 

शाम के सिंदूर में 

रंग रंगीला 

.

.

वह …


..

वह 

पूरे परिवार की 

जिंदगी का ताना बाना होती है 

घर भर के दुःख दर्द आँसू 

हँसी मुस्कान और रिश्ते… सब 

उसके आँचल की गांठ से बंधे 

उसकी डिग्री या बिना डिग्री वाली 

मगर गजब की स्किल्स के आस पास  

जीवन की आंच में धीरे धीरे पकते रहते हैं 

बच्चों के कच्ची माटी से भविष्य 

उसके सधे हाथों में गढ़ते रहते हैं 

और वह चौबीस घंटे धुरी सी 

घूमती रहती है

सबकी साँसों में साँसे पिरोती रहती है 

पता ही नहीं चलता 

वो कब जान लेती है 

सबके मन की बात 

पर शायद ही 

कोई जान पाता है 

कभी उसके मन की बात 

ये भी कोई कहाँ जान पाता है कि

कब होती है उसकी सुबह 

और कब होती है रात 

उसका सोना जागना 

सब कुछ मानो 

एक जादू की छड़ी सा 

न जाने 

कौन से पल में निपट जाता है

उसके पास 

सबकी फरमाइशों का खाता है

सबके दुःख दर्द का इलाज  

और घर भर के सपनों को 

पालने का जुझारूपन भी

मौका पड़े तो लड़ जाए 

यमराज से भी 

पता नहीं ये अदम्य साहस 

उसमे कहाँ से आता है 

जो भी हो उसका 

आसपास होना बहुत भाता है

जीवन से उसका अटूट नाता है 

(उसे माँ के नाम से जाना जाता है )


.
जब भी जहाँ 
ज़िंदगी में कड़ी धूप मिले
सघन वटवृक्ष सी छाया बन
सिर पर तने रहते हैं पिता 
.
वक़्त की 
आँधियों के सामने 
ढाल बन कर 
अडिग खड़े रहते हैं पिता 
बारिश हो तूफ़ान हो 
ओलों की सारी मार 
अपने सिर पर सहते हैं पिता 
.
सिर पर हाथ 
भले ही ना धरते हों  
पर सिर पर छत बनी रहे 
इसके लिए जीवन भर 
संघर्ष रत रहते हैं पिता 
.
माएँ
बच्चा कोख में पालती हैं 
मगर अस्तित्व शुरू होने के
पहले से ही
बच्चे के भविष्य की 
कल्पना संजोते हुए 
बच्चा दिमाग में
पालने लगते हैं पिता
.