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आँख के बदले आँख

जान के बदले में जान  

दया, क्षमा और अहिंसा में 

अब हम विश्वास नहीं करते न  

होता है सारा जहाँ अँधा तो होने दो 

बनती है सारी धरा मरघट तो बनने दो 

 अँधा बांटे रेवड़ी फिर-फिर अपने को दे

न होगा कोई और न पूछेगा कोई सवाल 

जिसका भी हो होगा मगर होगा 

बस अखंड एकक्षत्र राज्य 

यही तो चाहते हैं न हम  

अहम् ब्रम्हास्मि  

-:-


*

*

ये गूंगी मूर्तियाँ

जब से बोलने लगी हैं

न जाने कितनों की

सत्ता डोलने लगी है

जुबान खोली है

तो सज़ा भी भुगतेंगी

अब छुप छुपा कर नहीं

सरे आम…

खुली सड़क पर

होगा इनका मान मर्दन

कलजुगी कौरवों की सभा

सिर्फ ठहाके ही नहीं लगाएगी

बल्कि वीडियो भी बनाएगी

अपमान और दर्द की इन्तहा में

ये मूर्तियाँ

फिर से गूंगी हो जाएँगी

नहीं हुईं तो

इनकी जुबानें काट दी जाएँगी

मगर अपनी सत्ता पर

आँच नहीं आने दी जाएगी

-:-


 

एक अरब से भी

अधिक लोग

जिनकी मुट्ठी में

देश की किस्मत कैद है…

क्या इतने बेचारे हैं

कि यहाँ चंद ख़ूनी भेड़िये

अपना नफरत का खेल खेलते हैं

और बाकी लोग,

बस तमाशा देखते हैं

थोड़ा रोना गाना

थोड़ा हो हल्ला करते हैं

फिर रोजमर्रा की

ज़िंदगी में रम जाते हैं


 

घर बनाओ

मकान नहीं…

घर हमें जिन्दा रखता है

प्यार देता है, दुलार देता है

अपनेपन का अहसास देता है

दुखों की धूप हो तो छाँव देता है

रोने को मन हो तो इक ठाँव देता है

पर मकान इंसान को कुछ और नहीं देता

बस कर्ज का बोझ और थोड़ा अभिमान देता है

केंचुए…


-:-

काट दिये पर 

 सिल दी गयीं जुबानें 

और आँखों पर पट्टी भी बाँध दी

इस सबके बाद दे दी हाथ में कलम 

कि लो अब लिखो निष्पक्ष हो कर 

तुम्हारा फैसला जो भी हो 

बेझिझक लिखना 

-:- 

 गूंगे बहरे लाचार 

आपके रहमो करम पर जिन्दा लोग 

क्या मजाल कि जाएँ आपके खिलाफ 

ऐसी जुर्रत भी करें हमारी मति मारी गई है क्या 

हुजूर माई बाप आप की दया है तो हम हैं 

आप का जलवा सदा कायम रहे और

हमारे कांधों पर पाँव रख कर 

आप अपना परचम लहरायें 

विश्व विजयी कहलाएँ 

-:-

हम तो बस

 सदियों से यूँ ही  

तालियाँ बजाते आये हैं 

 आगे भी वही करेंगे राजा चाहे जो हो  

हमें क्या, भूखे प्यासे रोयेंगे तड़पेंगे 

मगर राजा की जय बोलेंगे  

और हक़ नहीं भीख के 

टुकड़ों पर पलेंगे 

-:-

जब जी चाहे 

पुचकारो मतलब निकालो 

फिर गाली दे कर हकाल दो 

हम इंसान कहाँ कुत्ते हैं 

दर असल हम कुत्ते भी नहीं 

वो भी कभी कभी भौंक कर काट लेते हैं

हम तो उस से भी गये गुजरे

रीढ़ विहीन, शायद

केंचुए हैं

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मैं चिराग़ हूँ उम्मीद का मुझे देर तक जलाए रखना
हवाएँ तो होंगी तुम हथेलियों की ओट बनाए रखना

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तूफ़ान तो होंगे ज़माने में बहुत मैं डर भी जाऊँ शायद
तू मुझे थाम के मेरे क़दमों को धरती पे जमाये रखना

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