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Posts Tagged ‘हिंदी’


चिड़िया  …. 

तुम सुन रही हो न 

घोंसले की 

दहलीज के बाहर 

आँधियाँ ही आँधियाँ हैं 

हर तरफ 

*

नोचने को पर तुम्हारे

उड़ रहे हैं 

गिद्ध ही गिद्ध यहाँ  

हर तरफ 

**

पैने करने होंगे 

अपने ही नाख़ून तुमको 

कोई नहीं आएगा बचाने  

मुखौटों के अंदर 

बस कायरों की 

भीड़ ही भीड़ है यहाँ 

हर तरफ 

***

सरे आम होने वाले अपराधों को लोग कैसे तमाशाई बनकर देखते रहते हैं, आखिर हमे हो क्या गया है… हम जिन्दा भी हैं या नहीं, आत्म विश्लेषण की बहुत जरूरत है 

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*

मन के 

आँगन की 

दीवारों पर… 

न जाने कहाँ कहाँ 

कौन कौन सी दरार ढूंढ कर 

उग आती हैं यादें 

और धीरे धीरे 

पीपल सी जड़ें जमा लेती हैं 

फिर एक दिन 

ढह जाती है आँगन की दीवार 

और यादें दफ़न हो जाती हैं 

अपने ही बोझ तले 

*

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.

बरस महीने दिन 

छोटे छोटे होते 

अदृश्य ही हो जाते हैं 

और मैं 

बैठी रहती हूँ 

अभी भी 

उनको उँगलियों पे 

गिनते हुए 

बार बार 

हिसाब लगाती हूँ 

मगर

जिन्दगी का गणित है कि

सही बैठता ही नहीं

.

.

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