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Posts Tagged ‘hindi poem’


 

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बरस महीने दिन 

छोटे छोटे होते 

अदृश्य ही हो जाते हैं 

और मैं 

बैठी रहती हूँ 

अभी भी 

उनको उँगलियों पे 

गिनते हुए 

बार बार 

हिसाब लगाती हूँ 

मगर

जिन्दगी का गणित है कि

सही बैठता ही नहीं

.

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मांग ली है मैंने 
अर्जुन से ..
महाभारत वाली दृष्टि
अब मेरी नज़र में
अपने या पराये नहीं,
बस युद्ध है !
     
      *

हृदय ने भी 
बांच ली है
कृष्ण की पूरी गीता
अब तो बस
कर्म ही 
धर्म है कर्त्तव्य है !!

 

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