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Posts Tagged ‘hindi poetry’


…. 

उठो

सीधी खड़ी हो

और खुद पर यकीन करो 

तुम किसी से कम नहीं हो 

तुम झूठे पौरुष के दंभ का शिकार 

जानवरों का शिकार तो

बिलकुल नहीं बनोगी

तुम जिंदगी में 

किसी से नहीं डरोगी ….

*** 

 

अपने

पैरों के नीचे की जमीन 

और सर के ऊपर का आसमान 

तुम खुद तलाश करोगी 

तुम्हे अपनी जिंदगी से जो चाहिए

उसके होने न होने की राह भी 

तुम खुद तय करोगी

तुम जिंदगी में 

किसी से नहीं डरोगी ….

***

 

रिश्तों का मोल 

तुम खूब पहचानती हो 

इनको निभाने का सलीका भी 

खूब जानती हो लेकिन 

तुम कमजोर नहीं हो

अपने स्वाभिमान की कीमत पर 

तुम कुछ नहीं सहोगी  

तुम जिंदगी में  

किसी से नहीं डरोगी ….

***

 

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एक बात कहें 

हमने ये जो ज़रा सा 

खुला आसमान देखा है न  

इसके लिए हमने 

बहुत जद्दोज़हद की है

वर्ना  तुमने तो 

पर उगने से पहले ही 

हमें जिबह करने में 

कोई कसर कहाँ छोड़ी थी

खैर

कोई बात नहीं 

बरसों से जमे ग्लेशियर 

अब पिघल गए हैं 

हमारे ऊपर की सब बर्फ 

बह गई है

धूप भी निकल आई है

हमारे परों में भी 

नई जान आई ही समझो 

ज़रा ठहरो 

फिर देखना हमारी परवाज़ 

हमारी मंज़िल आसमान है 

.

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बरस महीने दिन 

छोटे छोटे होते 

अदृश्य ही हो जाते हैं 

और मैं 

बैठी रहती हूँ 

अभी भी 

उनको उँगलियों पे 

गिनते हुए 

बार बार 

हिसाब लगाती हूँ 

मगर

जिन्दगी का गणित है कि

सही बैठता ही नहीं

.

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मांग ली है मैंने 
अर्जुन से ..
महाभारत वाली दृष्टि
अब मेरी नज़र में
अपने या पराये नहीं,
बस युद्ध है !
     
      *

हृदय ने भी 
बांच ली है
कृष्ण की पूरी गीता
अब तो बस
कर्म ही 
धर्म है कर्त्तव्य है !!

 

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