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Posts Tagged ‘manju’


…. 

उठो

सीधी खड़ी हो

और खुद पर यकीन करो 

तुम किसी से कम नहीं हो 

तुम झूठे पौरुष के दंभ का शिकार 

जानवरों का शिकार तो

बिलकुल नहीं बनोगी

तुम जिंदगी में 

किसी से नहीं डरोगी ….

*** 

 

अपने

पैरों के नीचे की जमीन 

और सर के ऊपर का आसमान 

तुम खुद तलाश करोगी 

तुम्हे अपनी जिंदगी से जो चाहिए

उसके होने न होने की राह भी 

तुम खुद तय करोगी

तुम जिंदगी में 

किसी से नहीं डरोगी ….

***

 

रिश्तों का मोल 

तुम खूब पहचानती हो 

इनको निभाने का सलीका भी 

खूब जानती हो लेकिन 

तुम कमजोर नहीं हो

अपने स्वाभिमान की कीमत पर 

तुम कुछ नहीं सहोगी  

तुम जिंदगी में  

किसी से नहीं डरोगी ….

***

 

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.

एक बात कहें 

हमने ये जो ज़रा सा 

खुला आसमान देखा है न  

इसके लिए हमने 

बहुत जद्दोज़हद की है

वर्ना  तुमने तो 

पर उगने से पहले ही 

हमें जिबह करने में 

कोई कसर कहाँ छोड़ी थी

खैर

कोई बात नहीं 

बरसों से जमे ग्लेशियर 

अब पिघल गए हैं 

हमारे ऊपर की सब बर्फ 

बह गई है

धूप भी निकल आई है

हमारे परों में भी 

नई जान आई ही समझो 

ज़रा ठहरो 

फिर देखना हमारी परवाज़ 

हमारी मंज़िल आसमान है 

.

.

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*

मन के 

आँगन की 

दीवारों पर… 

न जाने कहाँ कहाँ 

कौन कौन सी दरार ढूंढ कर 

उग आती हैं यादें 

और धीरे धीरे 

पीपल सी जड़ें जमा लेती हैं 

फिर एक दिन 

ढह जाती है आँगन की दीवार 

और यादें दफ़न हो जाती हैं 

अपने ही बोझ तले 

*

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.

बरस महीने दिन 

छोटे छोटे होते 

अदृश्य ही हो जाते हैं 

और मैं 

बैठी रहती हूँ 

अभी भी 

उनको उँगलियों पे 

गिनते हुए 

बार बार 

हिसाब लगाती हूँ 

मगर

जिन्दगी का गणित है कि

सही बैठता ही नहीं

.

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-:-

मिट्टी के घरौंदों को क्या आंधी से डराता है 

ये तो वो हैं, जिन्हें तूफ़ान हर रोज  जगाता है 

..

टूटेंगे बिखरेंगे..  और फिर से बनेंगे 

फितरत है ये इनकी गिर गिर के उठेंगे

-:- 

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तुम क्या जानो प्राण हमारे

तुम्हे हृदय ने कितना चाहा

कितना मान है किया तुम पर

तुमको कितनी बार सराहा

           -:-

बूझ लिया करते थे तुम भी

बिना कहे ही मेरी बातें

आँखों-आँखों कहते सुनते

कट जाया करती थीं रातें

         -:-

काँटा मुझको चुभता था

तो पीड़ा, तुमको होती थी

मेरे हिस्से के आंसू … ले,

आँख तुम्हारी रोती थी

          -:-

आज वही हूँ मैं और तुम भी

यूँ तो वैसे ही दिखते हो

फिर भी कुछ तो बदल गया

जो अनचीन्हे से लगते हो !!

-:-

 

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उधेड़ और बुन ….


यूँ तो जीवन में,  
बुनना, उधेड़ना 
और फिर बुनना 
चलता ही रहता है 
लेकिन सच कहो 
क्या फिर से 
टूटे हुए धागों को 
जोड़कर 
नया सा करना,  
बुनकर आकार देना
आसान होता है ?
…नहीं न ! 
तो क्यूँ नहीं 
सीख लेते नाजुक फंदों 
को सहेजना ताकि 
उधेड़ने की नौबत ही न आये 
और बरसों बरसों तक 
बनी रहे गरमाई 
रिश्तों के स्वेटर की 

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मांग ली है मैंने 
अर्जुन से ..
महाभारत वाली दृष्टि
अब मेरी नज़र में
अपने या पराये नहीं,
बस युद्ध है !
     
      *

हृदय ने भी 
बांच ली है
कृष्ण की पूरी गीता
अब तो बस
कर्म ही 
धर्म है कर्त्तव्य है !!

 

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१. 

तोड़ लो

मगर  ख़ामोशी  से,

सितारों  के  फूल…

चाँद  न जागे

सन्नाटे का जादू  टूट  जायेगा

२.

ख़ामोश  सी फिजायें

चुप चुप  सा  है  समां

फ़िर भी रात

सन्नाटी   नहीं

चाँद का  साथ…..

३.

यूँ तो

ख़ामोश है रात

पर सन्नाटे का भी

अपना अलग राग है

सुनो तो कान देकर –

सुनाई देंगी

रात  की सिसकियाँ…..



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