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बरस महीने दिन 

छोटे छोटे होते 

अदृश्य ही हो जाते हैं 

और मैं 

बैठी रहती हूँ 

अभी भी 

उनको उँगलियों पे 

गिनते हुए 

बार बार 

हिसाब लगाती हूँ 

मगर

जिन्दगी का गणित है कि

सही बैठता ही नहीं

.

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उधेड़ और बुन ….


यूँ तो जीवन में,  
बुनना, उधेड़ना 
और फिर बुनना 
चलता ही रहता है 
लेकिन सच कहो 
क्या फिर से 
टूटे हुए धागों को 
जोड़कर 
नया सा करना,  
बुनकर आकार देना
आसान होता है ?
…नहीं न ! 
तो क्यूँ नहीं 
सीख लेते नाजुक फंदों 
को सहेजना ताकि 
उधेड़ने की नौबत ही न आये 
और बरसों बरसों तक 
बनी रहे गरमाई 
रिश्तों के स्वेटर की 

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१. 

तोड़ लो

मगर  ख़ामोशी  से,

सितारों  के  फूल…

चाँद  न जागे

सन्नाटे का जादू  टूट  जायेगा

२.

ख़ामोश  सी फिजायें

चुप चुप  सा  है  समां

फ़िर भी रात

सन्नाटी   नहीं

चाँद का  साथ…..

३.

यूँ तो

ख़ामोश है रात

पर सन्नाटे का भी

अपना अलग राग है

सुनो तो कान देकर –

सुनाई देंगी

रात  की सिसकियाँ…..



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